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सातवें दिन श्रीकृष्ण ने गोवर्धन को नीचे रखा व पर्व की हुई शुरुआत

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हर साल गोवर्धन पूजा कर अन्नकूट का पर्व मनाया जाने लगा

गोप-गोपियों की करुण पुकार सुनकर श्रीकृष्ण गोवर्धन को अपनी कनिष्ठा अंगुली पर उठाकर छाता सा तान दीये

आरा:-समाज के विभन्न वर्गों के लोग अपने-अपने तरीके से भगवान श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना करते हैं। वही वैदिक क्षत्रीय यादव ग्रामीण इलाकों में दीपावली के ठीक एक दिन बाद सोहराई पर्व मनाते है। इसमें गाय की पूजा की जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में गाय को ही गृहलक्ष्मी माना जाता है। सोहराई में गोरेया पूजा का विशेष महत्व है। अपने-अपने गायों को अहले सुबह चरा-बजाकर, नदी-नालों और पोखरों में नहला-धुलाकर घर ले आते हैं। इसके पूर्व घर की गृहणियां गौशाला समेत घर आंगन को गोबर से लीप पोतकर उस पर चावल के चूर्ण या दुधिया मिट्टी के घोल से रंगोली बनाते हैं। कच्चे गोबर का ढेला बनाकर उसमें चिरचिटी लगाकर घर को शुद्ध करते हैं। वहीं गायों के घर आने पर उन्हें अमर पीठा खीर जो चावल के खीर में आटे को गोल-गोल बना एक साथ पकाया जाता है और उड़द दाल और चावल का बना खिचड़ीनुमा पखवा (पकवान) खिलाने की परंपरा है। साथ ही घर आए गायों का पैर धोकर आरती करने के बाद उनके सींगों में सिंदुर लगाकर पूजा अर्चना की जाती है, ताकि उनके घर में सालों भर सुख-समृद्धि बनी रही।

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार भगवान श्रीकृष्ण अपने सखा और गोप-ग्वालों के साथ गाय चराते हुए गोवर्धन पर्वत जा पहुंचे. वहां पहुंचकर उन्होंने देखा कि गोपियां 56 (छप्पन) प्रकार के भोजन रखकर बड़े उत्साह से नाच-गाकर उत्सव मना रही थीं. पूरे ब्रज में भी तरह-तरह के मिष्ठान्न और पकवान बनाए जा रहे थे. श्रीकृष्ण ने इस उत्सव का प्रयोजन पूछा तो गोपियां बोली-‘आज तो घर-घर में यह उत्सव हो रहा होगा, क्योंकि आज वृत्रासुर को मारने वाले मेघ देवता देवराज इन्द्र का पूजन होगा. यदि वे प्रसन्न हो जाएं तो ब्रज में वर्षा होती है, अन्न पैदा होता है, ब्रजवासियों का भरण-पोषण होता है, गायों का चारा मिलता है तथा जीविकोपार्जन की समस्या हल होती है.’

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यह सुनकर श्रीकृष्ण ने कहा, ‘यदि देवता प्रत्यक्ष आकर भोग लगाएं, तब तो तुम्हें यह उत्सव व पूजा ज़रूर करनी चाहिए.’ गोपियों ने यह सुनकर कहा, ‘कोटि-कोटि देवताओं के राजा देवराज इन्द्र की इस प्रकार निंदा नहीं करनी चाहिए. यह तो इन्द्रोज नामक यज्ञ है. इसी के प्रभाव से अतिवृष्टि और अनावृष्टि नहीं होती.’

श्रीकृष्ण बोले, ‘इन्द्र में क्या शक्ति है, जो पानी बरसा कर हमारी सहायता करेगा? उससे अधिक शक्तिशाली तो हमारा यह गोवर्धन पर्वत है. इसी के कारण वर्षा होती है. अत: हमें इन्द्र से भी बलवान गोवर्धन की पूजा करनी चाहिए.’ इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण के वाक-जाल में फंसकर ब्रज में इन्द्र के स्थान पर गोवर्धन की पूजा की तैयारियां शुरू हो गईं. सभी गोप-ग्वाल अपने-अपने घरों से सुमधुर, मिष्ठान्न पकवान लाकर गोवर्धन की तलहटी में श्रीकृष्ण द्वारा बताई विधि से गोवर्धन पूजा करने लगे.

उधर श्रीकृष्ण ने अपने दैविक रूप से पर्वत में प्रवेश करके ब्रजवासियों द्वारा लाए गए सभी पदार्थों को खा लिया तथा उन सबको आशीर्वाद दिया. सभी ब्रजवासी अपने यज्ञ को सफल जानकर बड़े प्रसन्न हुए. नारद मुनि इन्द्रोज यज्ञ देखने की इच्छा से वहां आए. गोवर्धन की पूजा देखकर उन्होंने ब्रजवासियों से पूछा तो उन्होंने बताया, ‘श्रीकृष्ण के आदेश से इस वर्ष इन्द्र महोत्सव के स्थान पर गोवर्धन पूजा की जा रही है.’ यह सुनते ही नारद उल्टे पांव इन्द्रलोक पहुंचे और उदास तथा खिन्न होकर बोले-‘हे राजन! तुम महलों में सुख की नींद सो रहे हो, उधर गोकुल के निवासी गोपों ने इद्रोज बंद करके आप से बलवान गोवर्धन की पूजा शुरू कर दी है. आज से यज्ञों आदि में उसका भाग तो हो ही गया. यह भी हो सकता है कि किसी दिन श्रीकृष्ण की प्रेरणा से वे तुम्हारे राज्य पर आक्रमण करके इन्द्रासन पर भी अधिकार कर लें.’

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नारद तो अपना काम करके चले गए. अब इन्द्र क्रोध में लाल-पीले हो गए. ऐसा लगता था, जैसे उनके तन-बदन में अग्नि ने प्रवेश कर लिया हो. इन्द्र ने इसमें अपनी मानहानि समझकर, अधीर होकर मेघों को आज्ञा दी, ‘गोकुल में जाकर प्रलयकालिक मूसलाधार वर्षा से पूरा गोकुल तहस-नहस कर दें, वहां प्रलय का सा दृश्य उत्पन्न कर दें.’ पर्वताकार प्रलयंकारी मेघ ब्रजभूमि पर जाकर मूसलाधार बरसने लगे. कुछ ही पलों में ऐसा दृश्य उत्पन्न हो गया कि सभी बाल-ग्वाल भयभीत हो उठे. भयानक वर्षा देखकर ब्रजमंडल घबरा गया. सभी ब्रजवासी श्रीकृष्ण की शरण में जाकर बोले, ‘भगवन! इन्द्र हमारी नगरी को डुबाना चाहता है, आप हमारी रक्षा कीजिए.’

गोप-गोपियों की करुण पुकार सुनकर श्रीकृष्ण बोले, ‘तुम सब गायों सहित गोवर्धन पर्वत की शरण में चलो. वही सब की रक्षा करेंगे.’ कुछ ही देर में सभी गोप-ग्वाल पशुधन सहित गोवर्धन की तलहटी में पहुंच गए. तब श्रीकृष्ण ने गोवर्धन को अपनी कनिष्ठा अंगुली पर उठाकर छाता सा तान दिया और सभी गोप-ग्वाल अपने पशुओं सहित उसके नीचे आ गए. सात दिन तक गोप-गोपिकाओं ने उसी की छाया में रहकर अतिवृष्टि से अपना बचाव किया. सुदर्शन चक्र के प्रभाव से ब्रजवासियों पर एक बूंद भी जल नहीं पड़ा. इससे इन्द्र को बड़ा आश्चर्य हुआ. यह चमत्कार देखकर जब इन्‍द्र को पता चला कि श्रीकृष्‍ण कोई साधारण मनुष्‍य नहीं बल्‍कि श्रीकृष्‍ण के अवतार हैं तो उन्‍हें अपनी भूल पर पश्चाताप हुआ. वह स्वयं ब्रज गए और भगवान कृष्ण के चरणों में गिरकर अपनी मूर्खता पर क्षमायाचना करने लगे. सातवें दिन श्रीकृष्ण ने गोवर्धन को नीचे रखा और ब्रजवासियों से कहा, ‘अब तुम हर साल गोवर्धन पूजा कर अन्नकूट का पर्व मनाया करो.’


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