HomeNewsबिहारजन्माष्टमी पर संगोष्ठी: महाभारत की लड़ाई में सामाजिक न्याय पर हुई चर्चा

जन्माष्टमी पर संगोष्ठी: महाभारत की लड़ाई में सामाजिक न्याय पर हुई चर्चा

Janmashtami Seminar: महाभारत केवल युद्ध की कथा नहीं, बल्कि समाज में न्याय-व्यवस्था, नैतिकता और जिम्मेदारी के व्यापक संदेशों का भी मार्गदर्शन करने वाला ग्रंथ है।

Bijay singh
  • हाइलाइट: Janmashtami Seminar
  • श्री कृष्ण जन्मोत्सव पर संगोष्ठी, महाभारत में सामाजिक न्याय के संदेश पर हुई विस्तृत चर्चा

आरा। श्री कृष्ण चेतना समिति के सभागार में शुक्रवार को कृष्ण जन्मोत्सव के पावन अवसर पर एक विचारोत्तेजक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का विषय ‘महाभारत की लड़ाई में सामाजिक न्याय’ रखा गया था, जिसमें महाभारत के प्रसंगों के माध्यम से धर्म, कर्तव्य, समानता और न्याय की अवधारणाओं पर गंभीर संवाद हुआ। वक्ताओं ने यह रेखांकित किया कि महाभारत केवल युद्ध की कथा नहीं, बल्कि समाज में न्याय-व्यवस्था, नैतिकता और जिम्मेदारी के व्यापक संदेशों का भी मार्गदर्शन करने वाला ग्रंथ है। कार्यक्रम का उद्देश्य यही था कि आज के सामाजिक संदर्भ में श्रीकृष्ण के विचारों और महाभारत के मूल संदेशों को समझकर समाज में समरसता और न्यायपूर्ण दृष्टि को मजबूत किया जाए।

Janmashtami Seminar: कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्था के अध्यक्ष नंद किशोर यादव ने की। उन्होंने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि कृष्ण जन्मोत्सव केवल उत्सव और परंपरा का पर्व नहीं है, बल्कि जीवन में सत्य, न्याय और धर्म की स्थापना के संकल्प को दोहराने का अवसर भी है। उन्होंने कहा कि महाभारत में कई ऐसे प्रसंग हैं जो बताते हैं कि सामाजिक न्याय की लड़ाई केवल तलवारों से नहीं, विचारों और विवेक से भी लड़ी जाती है। अध्यक्ष ने यह भी कहा कि जब समाज में अन्याय बढ़ता है, तब उसे रोकने के लिए नेतृत्व, नीति और लोकहित के पक्ष में दृढ़ता जरूरी हो जाती है—और श्रीकृष्ण का जीवन इसी दृढ़ता का उदाहरण प्रस्तुत करता है।

Janmashtami Seminar : संगोष्ठी का उद्घाटन संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया

संगोष्ठी का उद्घाटन विधायक राधाचरण साह, विधान पार्षद सोनू राय एवं पूर्व विधान पार्षद लालदास राय ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर किया। दीप प्रज्ज्वलन के साथ ही वातावरण में भक्तिभाव और चिंतन का समन्वय दिखाई दिया। उपस्थित लोगों ने इसे ज्ञान, न्याय और चेतना के प्रकाश का प्रतीक बताया। उद्घाटन के बाद अतिथियों ने मंच से कहा कि महाभारत के प्रसंग आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने उस काल में थे, क्योंकि समाज की चुनौतियां रूप बदल सकती हैं, लेकिन न्याय और अन्याय के बीच संघर्ष का मूल स्वरूप बना रहता है।

न्याय के लिए खड़ा होना ही धर्म है: राधाचरण साह

मुख्य वक्ता के रूप में विधायक राधाचरण साह ने कहा कि महाभारत के युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के सारथी की भूमिका निभाकर यह संदेश दिया कि नेतृत्व केवल आदेश देने का नाम नहीं, बल्कि मार्गदर्शन करने और संकट की घड़ी में सही दिशा दिखाने का भी नाम है। उन्होंने कहा कि युद्ध शुरू होने से पहले अर्जुन ने जब अपने धनुष-बाण रख दिए थे और मोह तथा दुविधा में पड़ गए थे, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें गीता का उपदेश दिया। गीता के उपदेश में आत्मा के अजर-अमर होने का संदेश देकर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यह समझाया कि कर्तव्य से विमुख होना न्याय के रास्ते से हटने के समान है। विधायक ने आगे कहा कि श्रीकृष्ण के उपदेश से अर्जुन को कर्तव्य का बोध हुआ और उन्होंने पुनः धनुष उठाकर युद्ध किया। इस प्रसंग को विधायक ने सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण से जोड़ते हुए कहा कि जब कोई समाज या व्यक्ति अन्याय देखकर भी मौन रह जाता है, तब वह भी कहीं न कहीं अधर्म को बढ़ावा देता है; इसलिए न्याय के लिए खड़ा होना ही धर्म है।

विधायक राधाचरण साह ने यह भी कहा कि गीता का सार सिर्फ आध्यात्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक भी है, क्योंकि वह व्यक्ति को निष्क्रियता से निकालकर जिम्मेदारी की ओर प्रेरित करती है। उन्होंने उपस्थित युवाओं से आह्वान किया कि वे महाभारत को केवल कथा या परंपरा के रूप में न देखें, बल्कि उससे जीवन के निर्णय, चरित्र निर्माण और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की सीख लें। उन्होंने कहा कि जब समाज में अधिकारों का हनन हो, कमजोर वर्ग दबाए जाएं या सत्य को झूठ के सामने झुकाने की कोशिश हो, तब गीता का संदेश—कर्तव्य और सत्य के पक्ष में अडिग रहने का—अधिक प्रासंगिक हो जाता है।

अधर्म का अंत सुनिश्चित है: सोनू राय

इसके बाद विधान पार्षद सोनू राय ने अपने संबोधन में कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने युद्ध को रोकने के लिए शांति दूत के रूप में हरसंभव प्रयास किया। उन्होंने विस्तार से बताया कि कृष्ण ने कौरव और पांडव दोनों पक्षों को समझाने का प्रयास किया ताकि रक्तपात टल सके और न्यायपूर्ण समाधान निकले। लेकिन दुर्योधन के हठ, अहंकार और अन्यायपूर्ण जिद के कारण उनका प्रयास सफल नहीं हो सका। विधान पार्षद ने कहा कि यह प्रसंग बताता है कि न्याय की स्थापना का पहला कदम हमेशा संवाद, समझौता और शांति की कोशिश होती है, पर जब अन्याय करने वाला पक्ष किसी भी तरह से न्याय स्वीकार करने को तैयार न हो, तब संघर्ष अपरिहार्य हो जाता है।

सोनू राय ने आगे कहा कि जब दुर्योधन ने श्रीकृष्ण को बंदी बनाने का प्रयास किया, तब उन्होंने विराट स्वरूप का दर्शन कराया। इस घटना का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उसी समय यह स्पष्ट हो गया था कि अधर्म का परिणाम क्या होने वाला है। उन्होंने इसे एक चेतावनी के रूप में भी बताया कि सत्ता, शक्ति या बहुमत के बल पर अन्याय को वैध नहीं बनाया जा सकता। उनके अनुसार, विराट स्वरूप का अर्थ केवल चमत्कार नहीं, बल्कि यह संदेश भी है कि सत्य और धर्म का स्वरूप विशाल होता है और अंततः वही विजय प्राप्त करता है। उन्होंने कहा कि आज भी अगर कोई व्यक्ति या व्यवस्था अन्याय को सामान्य मानकर चलना चाहती है, तो उसे महाभारत का यह संकेत याद रखना चाहिए कि अधर्म का अंत सुनिश्चित है।

श्रीकृष्ण ने धर्म का साथ दिया: लालदास राय

पूर्व विधान पार्षद लालदास राय ने महाभारत के एक महत्वपूर्ण प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि महाभारत युद्ध से पहले दुर्योधन और अर्जुन दोनों श्रीकृष्ण से सहयोग मांगने पहुंचे थे। दुर्योधन ने नारायणी सेना मांगी, जिसे श्रीकृष्ण ने स्वीकार करते हुए अपनी सेना उसके साथ भेज दी, जबकि स्वयं अर्जुन के सारथी बने। उन्होंने कहा कि यह प्रसंग श्रीकृष्ण के निष्पक्ष और धर्म के पक्ष में खड़े होने की भावना को दर्शाता है। पूर्व विधान पार्षद ने बताया कि श्रीकृष्ण ने प्रत्यक्ष युद्ध में हथियार नहीं उठाए, पर उन्होंने नीति, विवेक और मार्गदर्शन के माध्यम से धर्म का साथ दिया। उन्होंने इसे सामाजिक न्याय की दृष्टि से समझाते हुए कहा कि कभी-कभी किसी बड़े परिवर्तन के लिए सबसे महत्वपूर्ण भूमिका वह होती है जो दिशा और रणनीति तय करती है, न कि केवल ताकत का प्रदर्शन करती है।

लालदास राय ने यह भी कहा कि दुर्योधन ने सेना चुनी क्योंकि वह शक्ति पर विश्वास करता था, जबकि अर्जुन ने श्रीकृष्ण को चुना क्योंकि वह धर्म, नीति और सही मार्गदर्शन को सर्वोच्च मानता था। यही वजह है कि अंततः विजय धर्म के पक्ष में हुई। उन्होंने कहा कि इस कथा से यह भी सीख मिलती है कि समाज में न्याय की स्थापना के लिए केवल संसाधन और संख्या नहीं, बल्कि सही नेतृत्व और नैतिक निर्णय भी जरूरी हैं। उन्होंने कार्यक्रम में मौजूद लोगों से आग्रह किया कि वे व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में इस विचार को अपनाएं कि निर्णय हमेशा धर्म और न्याय के पक्ष में हों।

संगोष्ठी में उपस्थित अन्य वक्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि महाभारत में सामाजिक न्याय का संदेश केवल युद्ध के परिणाम में नहीं, बल्कि हर पात्र के कर्म और उसके नैतिक चुनाव में छिपा है। वक्ताओं ने पांडवों के संघर्ष, द्रौपदी के अपमान और उसके विरोध, भीष्म की प्रतिज्ञा, विदुर की नीति और कृष्ण की कूटनीति जैसे प्रसंगों का उल्लेख करते हुए बताया कि न्याय का प्रश्न केवल राजसत्ता का नहीं, बल्कि समाज की संवेदनशीलता और सामूहिक चेतना का भी है। वक्ताओं ने कहा कि जब तक समाज अन्याय के विरुद्ध आवाज नहीं उठाता, तब तक अन्याय करने वालों का साहस बढ़ता रहता है।

न्याय का अर्थ समान व्यवहार भी है

कार्यक्रम के दौरान यह भी कहा गया कि सामाजिक न्याय का अर्थ केवल आर्थिक या राजनीतिक समानता नहीं, बल्कि सम्मान, अवसर और अधिकारों में समान व्यवहार भी है। श्रीकृष्ण के जीवन में यह दृष्टि अनेक जगह दिखाई देती है, जहां वे कमजोर, पीड़ित और सत्य के पक्ष में खड़े नजर आते हैं। संगोष्ठी में यह चर्चा भी हुई कि आधुनिक समय में सामाजिक न्याय की लड़ाई में शिक्षा, संवाद और जागरूकता का विशेष महत्व है। युवाओं को चाहिए कि वे ग्रंथों के संदेश को वर्तमान जीवन से जोड़कर देखें और सामाजिक समरसता को बढ़ाने में अपनी भूमिका निभाएं।

अतिथियों का स्वागत यादव राम सकल सिंह भोजपुरिया ने किया। उन्होंने सभी आगंतुकों, वक्ताओं और उपस्थित नागरिकों का अभिनंदन करते हुए कहा कि ऐसे कार्यक्रम समाज में सकारात्मक विचारों को बढ़ावा देते हैं और नई पीढ़ी को संस्कृति के साथ-साथ मूल्य आधारित जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं। धन्यवाद ज्ञापन भुवनेश्वर यादव ने किया। उन्होंने आयोजन में सहयोग करने वाले सभी सदस्यों, अतिथियों और श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि संस्था आगे भी ऐसे विषयों पर संगोष्ठियां आयोजित करती रहेगी ताकि समाज में न्याय, नैतिकता और आपसी सम्मान की भावना को मजबूत किया जा सके।

Janmashtami Seminar: समारोह में हरेंद्र मुखिया, जिला परिषद के पूर्व उपाध्यक्ष लालबिहारी यादव, हकीम प्रसाद, आरती देवी, शैलेंद्र कुमार, गड़हनी प्रमुख विनोद यादव, कपिल यादव, मालिक यादव, सोनू रजक, उपप्रमुख राज पाल यादव, कन्हैया यादव, सुदर्शन यादव, अभियंता सुदर्शन यादव, महेंद्र गिरी, मंडल राजद के प्रदेश महासचिव मनोज सिंह, महेश यादव, अरुण यादव, कपिल देव अकेला, सत्यनारायण यादव, रजनीश यादव एवं महावीर बाबू सहित अन्य लोग मौजूद रहे। Janmashtami Seminar उपस्थित लोगों ने कार्यक्रम को ज्ञानवर्धक और प्रेरक बताया तथा कहा कि महाभारत के संदेशों को समझकर समाज में न्याय और सद्भाव को आगे बढ़ाया जा सकता है। आयोजन का समापन इसी संकल्प के साथ हुआ कि कृष्ण जन्मोत्सव के अवसर पर प्राप्त यह प्रेरणा केवल मंच तक सीमित न रहे, बल्कि समाज के व्यवहार, सोच और निर्णयों में भी दिखाई दे।

jay kumar
RAVI KUMAR
RAVI KUMAR
बिहार के भोजपुर जिला निवासी रवि कुमार एक भारतीय पत्रकार है एवं न्यूज पोर्टल खबरे आपकी के प्रमुख लोगों में से एक है।

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