Bharat Tiwari from Bilauti: बिलौटी गांव का वह युवा, जो कभी पुलिस को फूल भेंट किया करता था, उसे उसी खाकी की गोली खानी पड़ी?
- हाइलाइट: Bharat Tiwari from Bilauti
- रिपोर्ट: रवि कुमार
- भरत भूषण तिवारी की कहानी
- व्यवस्था से उपजा आक्रोश
- एक समाजसेवी का अंत
आरा। बिहार के भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र अंतर्गत बिलौटी गांव का नाम आज एक ऐसे घटनाक्रम की वजह से चर्चा में है, जिसने समाज के हर वर्ग को झकझोर कर रख दिया है। यह कहानी है भरत भूषण तिवारी की, एक ऐसा युवा जो समाज के लिए प्रेरणा था, जो खाकी को सम्मान देने वाला और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ मिलकर सामाजिक सरोकार के कार्यों में अग्रणी रहता था, वही भरत तिवारी अंत में 17 जून 2026 को पुलिस की गोली का शिकार हो गया। यह केवल एक व्यक्ति की मौत नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था पर एक बड़ा सवालिया निशान है, जिसने एक हंसते-खेलते और सकारात्मक सोच वाले युवा को इतना मजबूर कर दिया कि उसे हथियार उठाने जैसा चरम कदम उठाना पड़ा।

Bharat Tiwari from Bilauti : हर जगह मौजूद रहते थे भरत तिवारी
भरत भूषण तिवारी का व्यक्तित्व सामान्य युवाओं से अलग था। वह उन लोगों में से नहीं थे जो केवल सोशल मीडिया पर बदलाव की बातें करते हैं, बल्कि वे धरातल पर काम करने में विश्वास रखते थे। 15 अगस्त, 26 जनवरी या पुलिस सप्ताह जैसे आयोजनों में भरत की सक्रियता हमेशा देखते ही बनती थी। स्थानीय थाना प्रभारी से लेकर डीएसपी और जिले के पुलिस कप्तान तक से उनके संबंध बेहद प्रगाढ़ थे। क्योंकी, वह अक्सर प्रशासनिक अधिकारियों को अपने सामाजिक कार्यक्रमों में आमंत्रित करते थे ताकि युवाओं को सही दिशा मिल सके और प्रशासन व जनता के बीच एक सेतु का निर्माण हो सके। रक्तदान शिविर का आयोजन हो, गरीब और असहाय लोगों की मदद हो या खेल-कूद के माध्यम से युवाओं को नशामुक्त रखने की पहल, भरत तिवारी हर जगह मौजूद रहते थे।
लेकिन प्रश्न यह उठता है कि जिस युवा ने कभी कानून का विरोध नहीं किया, जो हमेशा पुलिस और प्रशासन के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलता था, वह आखिर दो से तीन वर्षों के भीतर इतना कैसे बदल गया? क्यों उसने अपनी फेसबुक वॉल पर बिहार सरकार के सिस्टम के प्रति इतनी गहरी नाराजगी जाहिर की? क्यों उसने एक अधिकारी विशेष के खिलाफ हिंसक टिप्पणी करने जैसा कठोर कदम उठाया? यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि इसके पीछे व्यवस्था का वह भयावह चेहरा है, जिसने भरत जैसे समाजसेवी के सब्र का बांध तोड़ दिया।

कलम से ज्यादा ताकत हथियार की है, इसके लिए जिम्मेदार कौन है?
भरत तिवारी का प्रशासन से मोहभंग होने के पीछे का कारण उनकी व्यक्तिगत हताशा नहीं, बल्कि सिस्टम में व्याप्त भ्रष्टाचार और अनसुनी शिकायतों की लंबी श्रृंखला है। एक ऐसा व्यक्ति जो हमेशा दूसरों के अधिकारों के लिए लड़ता रहा, जब उसने खुद को सिस्टम के द्वारा प्रताड़ित और अपमानित महसूस किया, तब उसका मानसिक द्वंद्व शुरू हुआ। प्रशासन के कुछ अधिकारियों का अहंकार और जनहित के कार्यों में की गई अनावश्यक देरी ने भरत के मन में यह धारणा पैदा कर दी कि अब कलम से ज्यादा ताकत हथियार की है। यह सोच एक सभ्य समाज के लिए घातक है, लेकिन इसके लिए जिम्मेदार कौन है?
किसी भी समाजसेवी का उग्र हो जाना यह दर्शाता है कि कहीं न कहीं सिस्टम ने अपना दरवाजा उसके लिए बंद कर दिया था। जब एक सम्मानित और सामाजिक व्यक्ति को बार-बार एसडीएम कार्यालय के चक्कर लगाने के बाद भी न्याय या सहयोग नहीं मिलता, तो उसका व्यवस्था से विश्वास उठ जाता है। भरत तिवारी द्वारा सोशल मीडिया पर दी गई चेतावनी और अंत में उठाया गया हथियार, उस दम घोंटू माहौल की परिणति है जिसमें कोई भी संवेदनशील व्यक्ति हताश हो सकता है।
भरत को आखिर किस अधिकारी ने इतना अपमानित किया?
क्या यह जांच का विषय नहीं है कि भरत तिवारी जैसे युवा को किस अधिकारी ने इतना अपमानित किया कि उसे अपराधी की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया? समाजसेवा से जुड़ा व्यक्ति जब बंदूक उठाता है, तो यह समाज की विफलता है। पुलिस की गोली से भरत तिवारी की दर्दनाक मौत ने कई अनसुलझे सवाल पीछे छोड़ दिए हैं। क्या बिलौटी गांव का वह युवा, जो कभी पुलिस को फूल भेंट किया करता था, उसे उसी खाकी की गोली खानी पड़ी?

भरत तिवारी की कहानी किसी अपराध की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे ‘सिस्टम क्रैश’ की कहानी है जहां संवाद खत्म हो चुका है। यह घटना प्रशासन के लिए आईना है कि अगर वे समाज के अच्छे और प्रबुद्ध लोगों की आवाज को नहीं सुनेंगे, तो वह हताशा कहीं न कहीं बड़े विस्फोट का रूप लेगी। जरूरत इस बात की है कि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच हो। उन परिस्थितियों और उन अधिकारियों की पहचान हो जिन्होंने भरत तिवारी को उस रास्ते पर धकेला, जिस पर वह कभी चलना नहीं चाहते थे।
आज बिलौटी गांव में इतना सन्नाटा क्यों है?
आज बिलौटी गांव में सन्नाटा है, क्योंकि उन्होंने एक ऐसा बेटा खो दिया जो समाज में बदलाव का सपना देखता था। भरत तिवारी का जाना समाज के लिए एक अपूरणीय क्षति है। यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर एक संवेदनशील समाज के तौर पर हम अपने युवाओं को कैसी व्यवस्था दे रहे हैं। न्याय की मांग केवल भरत तिवारी के लिए नहीं, बल्कि उस हर उस युवा के लिए है जो आज भी सिस्टम के गलियारों में अपनी बारी का इंतजार कर रहा है, ताकि उसे फिर कभी कोई भरत तिवारी हथियार न उठाना पड़े।





