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खून के रिश्ते जीत और हार के बीच बने दीवार

Kanhaiya Prasad Defeat: चुनाव के समय राजनीति में रिश्ते कितने गौण हो जाते हैं। जब अपने ही रक्त के संबंध विपक्षी खेमे की रणनीति का हिस्सा बन जाएं, तो जीत की राह स्वतः ही दुर्गम हो जाती है।

  • हाइलाइट: Kanhaiya Prasad Defeat
  • कन्हैया प्रसाद की हार की पटकथा लिखने में उनके अपनों की भूमिका

आरा। राजनीतिक गलियारों में अक्सर कहा जाता है कि सबसे कठिन लड़ाइयां वे होती हैं, जिन्हें हमें अपने ही अपनों के खिलाफ लड़ना पड़ता है। बिहार की राजनीति में हालिया भोजपुर-सह-बक्सर विधान परिषद उपचुनाव के परिणाम ने इस कहावत को एक बार फिर चरितार्थ कर दिया है। जदयू प्रत्याशी कन्हैया प्रसाद की हार आज राजनीतिक विश्लेषकों और आम जनता के बीच चर्चा का मुख्य विषय बनी हुई है। जिस सीट पर पिछले चुनाव में उनके पिता ने भारी मतों के अंतर से राजद के दिग्गज उम्मीदवार अनिल सम्राट को पराजित किया था, उसी सीट पर उप-चुनाव के दौरान कन्हैया प्रसाद को राजद के सोनू राय के हाथों करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा।

Kanhaiya Prasad Defeat : हार की पटकथा लिखने में उनके अपनों की भूमिका

इस पराजय के पीछे के कारणों का विश्लेषण करने पर जो तथ्य सामने आते हैं, वे बेहद चौंकाने वाले हैं। चुनावी राजनीति में बाहरी विरोधियों से लड़ना तो स्वाभाविक है, लेकिन जब अपने ही खून के रिश्ते जीत और हार के बीच की दीवार बन जाएं, तो परिणाम अक्सर निराशाजनक होते हैं। कन्हैया प्रसाद के मामले में भी ठीक यही हुआ। उनकी हार की पटकथा लिखने में उनके अपनों की भूमिका सबसे अधिक प्रभावी रही।

चाचा हकीम प्रसाद की भूमिका

सबसे पहले बात करते हैं उनके चाचा हकीम प्रसाद की। हकीम प्रसाद जो स्वयं राजद के समर्पित नेता हैं, उन्होंने पारिवारिक संबंधों से ऊपर उठकर राजनीतिक विचारधारा और दलगत निष्ठा को प्राथमिकता दी। उन्होंने न केवल अपने भतीजे के खिलाफ मोर्चा संभाला, बल्कि अपनी पूरी ऊर्जा और संसाधन महागठबंधन के उम्मीदवार को जिताने में झोंक दिए। एक ही परिवार के दो अलग-अलग ध्रुवों पर खड़े होने का यह उदाहरण क्षेत्र में चर्चा का विषय बना रहा। हकीम प्रसाद ने जिस रणनीति के साथ चुनावी अभियान में सक्रियता दिखाई, उससे कन्हैया प्रसाद के लिए स्थिति और भी विकट हो गई।

आरा से सांसद सुदामा प्रसाद की भूमिका

इसके अतिरिक्त, इस हार के समीकरणों में उनके मामा और आरा से सांसद सुदामा प्रसाद की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। महागठबंधन के एक कद्दावर नेता के रूप में सुदामा प्रसाद ने मतदान के दिन ही उन्होंने सार्वजनिक रूप से महागठबंधन की जीत का जो दावा किया था, वह अंततः सत्य साबित हुआ। एक वरिष्ठ नेता और रिश्तेदार के रूप में उनकी यह सक्रियता कन्हैया प्रसाद के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका थी।

कहते हैं न कि हमें तो अपनों ने लूटा, गैरों में कहां दम था। कन्हैया प्रसाद की यह हार किसी बाहरी राजनीतिक आंधी का परिणाम नहीं, बल्कि भीतरघात और अपनों की कुशल चुनावी रणनीति का नतीजा है। यह घटनाक्रम राजनीति में उस कड़वे सच को उजागर करता है, जहां कभी-कभी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं और राजनीतिक निष्ठाएं पारिवारिक मर्यादाओं और रिश्तों से कहीं अधिक वजनदार हो जाती हैं।

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