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काली सूची वाली एनजीओ पर शाहपुर नपं मेहरबान

Shahpur NGO: कानूनविद् की माने तो जब सरकारी धन का दुरुपयोग हो, तो केवल अनुबंध रद्द कर देना ही पर्याप्त नहीं है।

  • हाइलाइट: Shahpur NGO
  • करीब डेढ़ साल तक एनजीओ को होती रही बड़ी राशि की भुगतान
  • अनुबंध रद्द एनजीओ पर आखिर नपं प्रशासन की मेहरबानी क्यों ?
  • ना FIR और ना ही नपं प्रशासन ने किया मनी रिकवरी सूट फ़ाइल

पटना। भोजपुर जिला के शाहपुर नगर पंचायत में सामने आया एक मामला नपं प्रशासन की व्यवस्था की खामियों और जवाबदेही के अभाव को दर्शाता है। प्रताप सेवा संकल्प, गोविंद फूलकान, मुजफ्फरपुर नामक एनजीओ को शाहपुर नगर क्षेत्र में स्वच्छता का जिम्मा सौंपा गया था। अनुबंध के अनुसार, संस्था पर नियमित रूप से कचरे का उठाव, निस्तारण, नाला सफाई और सड़कों की स्वच्छता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी थी। इसके बदले में उन्हें प्रति माह 11 लाख 87 हजार रुपये का भारी-भरकम भुगतान किया जाता था। विडंबना यह है कि इतनी बड़ी राशि खर्च करने के बावजूद धरातल पर परिणाम शून्य रहे।

अनुबंध की शर्तों का घोर उल्लंघन: हर माह बड़ी राशि लेने के बावजूद एनजीओ द्वारा प्रमुख रूप से निम्नलिखित जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं किया गया:

  • सड़क और नालों की नियमित सफाई का अभाव।
  • मुख्य मार्गों पर प्रस्तावित नाइट स्वीपिंग (रात में सफाई) पूरी तरह नदारद रही।
  • डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण में लापरवाही, जिसके कारण कचरा जगह-जगह फैला रहा।
  • श्रमिकों के हितों के साथ खिलवाड़, विशेषकर उनके ईपीएफ (EPF) और ईएसआई (ESI) अंशदान का समय पर जमा न करना।
  • श्रम कानूनों का उल्लंघन करते हुए पारदर्शी तरीके से मजदूरी का भुगतान न करना।

NGO: प्रशासनिक कार्रवाई और वर्तमान स्थिति

इन गंभीर अनियमितताओं के दृष्टिगत, तत्कालीन कार्यपालक पदाधिकारी नेशात आलम ने एक कड़ा कदम उठाते हुए प्रताप सेवा संकल्प का अनुबंध रद्द कर दिया और संस्था को तीन साल के लिए ब्लैकलिस्ट कर दिया। यह निर्णय स्वागत योग्य था, लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं होती।

अनुबंध की स्पष्ट शर्त थी, इसके बावजूद करीब डेढ़ साल तक एनजीओ के लिए बड़ी राशि-11 लाख 87 हजार की निकासी हर माह होती रही। जिससे स्पष्ट होता है कि यह आर्थिक धोखाधड़ी का मामला है। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि प्रशासन द्वारा इस एनजीओ के खिलाफ अब तक न तो मनी रिकवरी सूट फाइल किया गया है और न ही धोखाधड़ी के आरोप में कोई एफआईआर (FIR) दर्ज कराई गई है। कानूनविद् की माने जब सरकारी धन का दुरुपयोग हो, तो केवल अनुबंध रद्द कर देना ही पर्याप्त नहीं है।

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