Hari Narayan High School : बाबू हरि नारायण सिन्हा ने इस विद्यालय के निर्माण के लिए अपनी बेशकीमती जमीन दान दी थी। उस दौर में पूरे ग्रामीण समुदाय ने एकजुट होकर अपने पूर्वजों के माध्यम से हर घर से एक मुट्ठी चावल इकट्ठा किया था, ताकि शिक्षा की इस नींव को मजबूत किया जा सके।
- हाईलाइट:Hari Narayan High School,shahpur
- जिन हाथों ने गांव के बच्चों को पढ़ने का अवसर दिया
- उनके द्वारा स्थापित पहचान को खत्म करना बेहद दुखद
बिहार के सरकारी विद्यालयों के नाम बदलने की सरकारी कवायद इन दिनों सूबे के शैक्षणिक और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है। हाल ही में राज्य के 551 विद्यालयों का नाम बदलकर सरस्वती विद्या निकेतन किए जाने के फैसले ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। इस बदलाव की आंच अब भोजपुर जिले के शाहपुर स्थित हरि नारायण उच्च विद्यालय तक पहुंच गई है, जहां के नाम परिवर्तन से स्थानीय लोग और जनप्रतिनिधि खासे नाराज हैं।
शाहपुर नगर पंचायत के पूर्व उपाध्यक्ष गुप्तेश्वर साह ने इस निर्णय पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इसे शिक्षा के भगवाकरण और राजनीति से प्रेरित कदम करार दिया है। उन्होंने विद्यालय के ऐतिहासिक महत्व और इससे जुड़ी भावनाओं का जिक्र करते हुए पुरानी यादें ताजा कीं। गुप्तेश्वर साह के अनुसार, यह कोई सामान्य स्कूल नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक लंबा संघर्ष और समुदाय की अटूट निष्ठा है। बाबू हरि नारायण ने इस विद्यालय के निर्माण के लिए अपनी बेशकीमती जमीन दान दी थी। उस दौर में पूरे ग्रामीण समुदाय ने एकजुट होकर अपने पूर्वजों के माध्यम से हर घर से एक मुट्ठी चावल इकट्ठा किया था, ताकि शिक्षा की इस नींव को मजबूत किया जा सके।
Hari Narayan High School: पूर्वजों के त्याग और सामाजिक भागीदारी का प्रतीक
स्थानीय निवासियों का कहना है कि यह स्कूल केवल ईंट-पत्थर की इमारत नहीं, बल्कि उनके पूर्वजों के त्याग और सामाजिक भागीदारी का प्रतीक है। गुप्तेश्वर साह ने सरकार के इस फैसले को सीधे तौर पर उन दानदाताओं, उनके वंशजों और उस पूरे समुदाय के साथ अन्याय करार दिया है, जिन्होंने अपने सीमित संसाधनों और कठिन श्रम से बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए इस संस्थान को खड़ा किया था।
वे आगे कहते हैं कि जिस तरह से स्कूल के पुराने नामों को बदला जा रहा है, वह न केवल उस स्थानीय इतिहास को मिटाने की कोशिश है, बल्कि दानदाताओं के योगदान का अनादर भी है। उन्होंने इसे एक प्रकार का अपराध बताते हुए कहा कि जिन हाथों ने गांव के बच्चों को पढ़ने का अवसर देने के लिए अपनी जमीन और अनाज तक दान कर दिया, आज उनके द्वारा स्थापित पहचान को खत्म करना बेहद दुखद है।
फिलहाल, इस मामले को लेकर शाहपुर में असंतोष बढ़ता जा रहा है। सवाल यह है कि क्या विकास और आधुनिकीकरण के नाम पर की जा रही यह कवायद उन ऐतिहासिक आधारों को नजरअंदाज कर सकती है, जिनसे शिक्षा के इन केंद्रों ने अपनी यात्रा शुरू की थी? यह मामला अब एक बड़े विमर्श की मांग कर रहा है, जहां एक ओर सरकार अपनी नीति का पक्ष रख रही है, तो दूसरी ओर ग्रामीण अपनी विरासत को बचाने के लिए सड़कों पर उतरने की चेतावनी दे रहे हैं। शिक्षा का मुख्य उद्देश्य बच्चों को संस्कारवान और ज्ञानी बनाना है, लेकिन इस प्रक्रिया में सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान को बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।







