- हाइलाइट: Scene of Jawainia
- तबाही का मंजर
- कटाव पीड़ितों की दुर्दशा
- राहत शिविरों में सहारा
- सरकार की उदासीनता पर सवाल
- मुख्यमंत्री से अपील
बिहार,आरा। भोजपुर जिले के शाहपुर अंचल स्थित जवैनिया गांव में गंगा नदी का कटाव लगातार जारी है, जिससे स्थिति और भी गंभीर होती जा रही है। कल तक जो मकान गंगा किनारे खड़े दिख रहे थे, वे भी अब गंगा नदी में समा चुके हैं, जिससे कई परिवार बेघर हो गए हैं। जो घर बचे है उनके खिड़की, दरवाजे खुद तोड़कर सामान सुरक्षित जगहों पर भेजे गये, क्योंकि वे बेबस हैं और अपने आशियाने छोड़ने को मजबूर हैं। गंगा नदी के कटाव से केवल मकान ही नहीं, बल्कि जीवन और आजीविका भी प्रभावित हुई है।
ग्रामीणों की बेबसी और राहत शिविरों का सहारा
गंगा नदी के लगातार कटाव ने ग्रामीणों को मुश्किल स्थिति में डाल दिया है। उनके पास अब सरकारी राहत शिविरों में जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। अपने जीवन भर की कमाई से बनाए गए घरों को अपनी आंखों के सामने गंगा में विलीन होते देखना, उनकी बेबसी साफ झलक रही है।
Scene of Jawainia – तबाही का मंजर – नवनिर्मित दो मंजिला मकान गंगा में समाया
ज्वाइनिया गांव में गंगा नदी के किनारे खड़ा नवनिर्मित दो मंजिला मकान जो कल तक मुंबई के समुद्री किनारे के आलीशान घरों जैसा दिखता था, अब पूरी तरह से गंगा नदी में समा चुका है। यह मकान गांव के एक व्यवसायी का था, जिन्होंने अपने पिता के लिए इसे बनवाया था और इसकी अनुमानित लागत ₹35 लाख बताई जा रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कल तक जो अन्य मकान खड़े थे, वे भी अब पानी में बह गए हैं।
कटाव पीड़ितों की दुर्दशा
कटाव प्रभावित लोग अब बांधों पर प्लास्टिक की चादरों के नीचे रहने को मजबूर हैं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इन अस्थायी ठिकानों के समीप सांप जैसे जहरीले जीव भी देखे गए हैं, जिससे छोटे बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं भी हैं।
सरकार की उदासीनता पर सवाल
स्थानीय लोगों में सरकार के प्रति भारी नाराजगी है। उनका आरोप है कि सरकार के लापरवाही के कारण ये भयावह हालात पैदा हुए हैं। उनका कहना है कि अगर सरकार समय रहते कदम उठाती तो आज ये स्थिति नहीं होती। लोगों की मांग है कि सरकार के मुखिया को गांव आकर लोगों से मिलना चाहिए।
मुख्यमंत्री से अपील
ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से अपील की है कि वे आरा आ रहे हैं, तो वे ज्वाइनिया गांव भी आएं, जो आरा से केवल 20 किलोमीटर दूर है। लोगों का मानना है कि इस मुश्किल घड़ी में मुख्यमंत्री को उनके दुख-दर्द में शामिल होना चाहिए। यह सरकार का दायित्व भी है कि वह पीड़ित लोगों से मिले, उनकी बातें सुने और उनके दर्द को समझे।


