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सरकार की विदेश नीति और भारत की स्थिति पर आरके सिंह के गंभीर सवाल

Serious questions from RK Singh: क्या हम अमेरिका के गुलाम हो गए हैं? प्रधानमंत्री अमेरिका से घबराते हैं, इसका क्या कारण है? कांग्रेस का कहना है कि एपस्टीन फाइलों में पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी और अनिल अंबानी के साथ-साथ प्रधानमंत्री का भी नाम है और उसी के कारण अमेरिका प्रधानमंत्री से जो कहता है वही वे करते हैं, अर्थात प्रधानमंत्री ब्लैकमेल हो रहे हैं। क्या इसमें कोई सच्चाई है? यदि इसमें कोई सच्चाई है तो देश को शर्मिंदा करने के बजाय प्रधानमंत्री जी को तुरंत इस्तीफा दे देना चाहिए।

  • हाइलाइट: Serious questions from RK Singh
  • भारत की विदेश नीति और गिरता वैश्विक स्तर:
  • पूर्व केंद्रीय मंत्री राजकुमार सिंह की गहरी चिंताएं

आरा के पूर्व सांसद एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री राजकुमार सिंह ने वर्तमान केंद्र सरकार की विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय पटल पर भारत की स्थिति को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अपने 50 वर्षों के सार्वजनिक सेवा और प्रशासनिक अनुभव का हवाला देते हुए उन्होंने कहा है कि वर्तमान सरकार के कार्यकाल में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की साख में जो गिरावट आई है, वैसी उन्होंने अपने पूरे करियर में कभी नहीं देखी।

राजकुमार सिंह के अनुसार, भारत और रूस के संबंध सदैव मित्रतापूर्ण रहे हैं। वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में जब भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस से सस्ता तेल खरीदने का निर्णय लिया, तो यह एक स्वतंत्र राष्ट्र का संप्रभु निर्णय था। हालांकि, अमेरिका ने रूस-यूक्रेन युद्ध का बहाना बनाकर भारत पर लगातार दबाव डाला कि वह रूस से तेल की खरीद बंद करे और इसके बदले अमेरिका से तेल खरीदे।

विडंबना यह है कि एक ओर अमेरिका भारत पर दबाव बना रहा था, वहीं दूसरी ओर यूरोप लगातार रूस से तेल और गैस की आपूर्ति ले रहा था। स्वयं अमेरिका भी रूस से विभिन्न वस्तुओं का आयात जारी रखे हुए था। पूर्व मंत्री ने प्रश्न उठाया कि जब विकसित देश रूस के साथ व्यापार कर रहे थे, तब भारत ने अमेरिका के इस दोहरे मापदंड पर सवाल क्यों नहीं उठाया? उन्होंने इस चुप्पी को सरकार की कूटनीतिक कमजोरी करार दिया है।

आर्थिक मोर्चे पर भी सिंह ने सरकार के रवैये की आलोचना की है। उन्होंने उल्लेख किया कि अमेरिका ने भारतीय सामग्री पर 50 प्रतिशत का भारी टैरिफ थोप दिया। अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक प्रथाओं के अनुसार, भारत को भी इसके जवाब में अमेरिकी उत्पादों और विशेष रूप से डिजिटल सामग्री पर समान टैरिफ लगाना चाहिए था। परंतु भारत सरकार ने अमेरिका के इस अनुचित कदम के खिलाफ न तो कोई कड़ा विरोध दर्ज कराया और न ही कोई जवाबी टैरिफ लगाया। यह प्रश्न उठता है कि 140 करोड़ की आबादी वाले एक महान और शक्तिशाली राष्ट्र को अपनी आर्थिक रक्षा करने में इतनी झिझक क्यों हो रही है?

एक अन्य गंभीर मुद्दे पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि भारत जैसे देश को किसी भी देश से व्यापार करने के लिए किसी बाहरी शक्ति की अनुमति की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। परंतु हाल के घटनाक्रमों में यह देखा गया कि रूस से तेल खरीद की मात्रा बढ़ाने के विषय पर भारत को अमेरिका से अनुमति मांगनी पड़ी। अमेरिका द्वारा केवल 30 दिनों के लिए दी गई यह अनुमति न केवल कूटनीतिक रूप से अपमानजनक है, बल्कि यह देश के आत्मसम्मान को भी ठेस पहुँचाती है।

राजकुमार सिंह ने कांग्रेस द्वारा लगाए गए उन आरोपों का भी उल्लेख किया है, जिनमें ‘एपस्टीन फाइलों’ का हवाला देते हुए दावा किया गया है कि प्रधानमंत्री सहित देश के कुछ अन्य प्रमुख नामों का उल्लेख वहां है। इन आरोपों के अनुसार, अमेरिका इसी जानकारी का उपयोग कर भारतीय नेतृत्व पर दबाव बना रहा है। सिंह ने कहा कि यदि इन दावों में थोड़ी भी सच्चाई है कि प्रधानमंत्री किसी प्रकार के अंतरराष्ट्रीय ‘ब्लैकमेल’ का शिकार हो रहे हैं, तो यह राष्ट्र की सुरक्षा और संप्रभुता के लिए अत्यंत खतरनाक है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि देश के गौरव को ताक पर रखकर फैसले लिए जा रहे हैं, तो प्रधानमंत्री को नैतिकता के आधार पर तुरंत अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए।

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