Save Javainiya: जवैनिया गांव में कटाव का संकट, राहत कार्यों की पारदर्शिता, और नेताओं की बयानबाजी—तीनों ही मुद्दे एक साथ चर्चा के केंद्र में बने हुए हैं।
- हाइलाइट: Save Javainiya
- गंगा कटाव संकट से जवैनिया गांव को बचाने की जद्दोजहद
27 मई, आरा। भारत की सबसे महत्वपूर्ण नदियों में से एक गंगा, जिसे हमारे देश में पवित्र माना जाता है, कभी-कभी विनाश का कारण भी बन जाती है। बिहार के भोजपुर जिले में स्थित जवैनिया गांव इसी विनाश का एक जीवंत उदाहरण है। यह गांव शाहपुर प्रखंड के दमोदरपुर पंचायत के अंतर्गत आता है और पिछले कुछ सालों से गंगा के तेज कटाव से जूझ रहा है। 2025 का साल इस गांव के लिए विशेष रूप से विनाशकारी साबित हुआ, जब गंगा के कटाव ने ऐसी भयावह स्थिति पैदा कर दी कि कई परिवार अपने घरों को खोते हुए असहाय देखते रह गए। यह केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं है, बल्कि एक सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संकट का जटिल मिश्रण है जो जवैनिया के निवासियों के जीवन को हर दिन प्रभावित कर रहा है।
Save Javainiya – गंगा का कटाव: प्रकृति का विनाश या मानवीय उपेक्षा?
गंगा का कटाव एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन इसकी तीव्रता में मानवीय हस्तक्षेप की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। पूर्व में बालू निकासी के बाद जवैनिया गांव में जो कटाव देखा गया, वह सामान्य से कहीं अधिक गंभीर है। नदी के प्रवाह को नियंत्रित करने वाली संरचनाओं की कमजोरी, बांध और तटबंधों के रखरखाव में लापरवाही, और कटाव नियंत्रण के अधूरे उपायों ने इस समस्या को बढ़ा दिया।
जवैनिया गांव की दर्दभरी कहानी
Save Javainiya: स्थानीय लोगों के अनुसार, पिछले दस सालों में गांव की काफी जमीन गंगा में समा गई है। हर बारिश के मौसम में लोगों का डर बढ़ता है कि इस बार कितनी जमीन और घर खो जाएंगे। 2025 में जब कटाव अपने चरम पर पहुंचा, तो पूरे गांव में त्रास का माहौल बन गया। घरों की दीवारें धीरे-धीरे गंगा की ओर खिसकने लगीं, एक के बाद एक घर टूटने लगे, और खेतों की मिट्टी बहने लगी। यह दृश्य केवल दर्दनाक नहीं था, बल्कि गांव के लोगों के लिए अस्तित्व का संकट बन गया।
2025 की त्रासदी: जब घर और सपने गंगा में बह गए
2025 का साल जवैनिया के इतिहास में सबसे काला साल साबित हुआ। इस साल गंगा का कटाव इतना भयंकर हो गया कि कई परिवार रातोंरात बेघर हो गए। जो घर पीढ़ियों से उनके परिवार के साथ थे, जहां उन्होंने अपने बचपन की यादें संजोई थीं, वे सब एक झटके में मिट्टी में मिल गए।
इस त्रासदी का असर केवल आवास तक सीमित नहीं रहा। कई परिवारों की जीविका के साधन भी नष्ट हो गए। खेत जो उनकी आय का मुख्य स्रोत थे, गंगा के पानी में डूब गए। पशुधन, कृषि उपकरण, और अन्य संपत्तियां सब कुछ खो गई। बुजुर्गों के लिए तो यह और भी दर्दनाक था, क्योंकि वे अपनी जीवनभर की कमाई और संपत्ति को गंगा में समाते देख रहे थे।
पलायन की नौबत आ गई। कई परिवारों को मजबूरन गांव छोड़ना पड़ा और आसपास के गांव व शहरों की ओर पलायन करना पड़ा। जो लोग रहे भी, उनके मन में डर और असुरक्षा की भावना घर कर गई। बांध पर आश्रय, सरकारी लंगर में भोजन, भयानक राते और गंगा के लहरों में हर अरमान एक झटके में मिट्टी में मिल गए।
सरकार की कार्रवाई: 52 करोड़ 56 लाख रुपये की स्वीकृति
Save Javainiya: 2025 की इस त्रासदी के बाद, सरकार को कार्रवाई करनी पड़ी। गंगा नदी के लगातार बढ़ते कटाव से प्रभावित जवइनिया गांव एवं आसपास के क्षेत्रों को बचाने के लिए बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल बक्सर की देखरेख में इस साल 2026 कटाव निरोधी कार्य शुरू कर दिया गया है। सरकार द्वारा इस महत्वपूर्ण योजना के लिए करीब 52 करोड़ 56 लाख रुपये की स्वीकृति दी गई है।
योजना के तहत जवइनिया गांव के समीप गंगा नदी के दाहिने तट पर लगभग 1200 मीटर लंबाई में पिचिंग और बोल्डर के माध्यम से मजबूत सुरक्षा कार्य कराया जाएगा। यह कार्य बक्सर से कोइलवर के बीच चेन संख्या 58 से 59.20 किलोमीटर के दायरे में किया जा रहा है।
लेकिन जैसा कि अक्सर ऐसी परियोजनाओं में होता है, यहां भी समस्याएं सामने आने लगीं है। काम की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठने लगे है, कार्यों में पारदर्शिता के अभाव को लेकर ठेकेदार के साथ भाजपा नेता के विवाद भी सामने आए है। काम कि गति को लेकर स्थानीय लोगों में नाराजगी भी देखी गई है। हालांकि, इस योजना को समय पर पूरा करने की बात संवेदक द्वारा कही गई है।
संवेदक और भाजपा नेता के बीच आरोप-प्रत्यारोप
जवैनिया की कटाव की समस्या को लेकर राजनीति भी तेज हो गई। संवेदक सुशील कुमार और भाजपा नेता भुअर ओझा के बीच एक जुबानी जंग शुरू हो गई है। दोनों ही एक-दूसरे पर आरोप लगाने में लगे है। दोनों ही पक्ष एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहे है।
इन आरोप-प्रत्यारोपों के दौरान कई मुद्दे उठाए गए। काम की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठे कि क्या सही तरीके से निर्माण हो रहा है। ठेकेदार पर टैक्स की चोरी का आरोप लगा। ठेकेदार की ओर से जवाब आया कि वह सभी जिम्मेदारियां निभा रहे हैं और भाजपा नेता पर तंज कसते कहा कि अंगूर नहीं मिले तो अंगूर खट्टे है। जैसे मुहबरों का उपयोग किया।
इस सब बीच, आम लोग भ्रमित हो गए है। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि सच क्या है और झूठ क्या है। जो पैसा उनके गांव को बचाने के लिए आया है, वह सही तरीके से खर्च हो रहा है या नहीं, यह सवाल लोगों के मन में उठने लगा है।
पूर्व विधायक राहुल तिवारी का भाजपा नेता पर आरोप
इस पूरे विवाद में पूर्व विधायक राहुल तिवारी ने भी अपनी भूमिका निभाई। उन्होंने स्थानीय विधायक राकेश ओझा और उनके चाचा भुअर ओझा पर सवाल उठाए। राहुल तिवारी का मानना था कि वर्तमान विधायक जवैनिया की समस्या को लेकर गंभीर नहीं है और वे चुप रहकर अपने चाचा के हितों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
जवैनिया कटान के दोषी को बोलने का हक नहीं:- विधायक
वर्तमान विधायक राकेश ओझा ने पूर्व विधायक के आरोपों का जवाब दिया। उन्होंने कहा कि पूर्व विधायक के समय जवैनिया की समस्या को लेकर सही कदम नहीं उठाए गए थे। इनके कार्यकाल में बने ठोकर बांध की नाकामी के कारण सरकार ने 52 करोड़ रुपयों की योजना लागू की है, जो एक सकारात्मक कदम है। विधायक राकेश ओझा ने यह भी कहा कि निर्माण कार्य चल रहे हैं और जल्द ही इसके परिणाम दिखने लगेंगे।
एक बार फिर चर्चा के केंद्र में जवैनिया
जवैनिया के लोगों के लिए मानसून का आना एक नई चिंता लेकर आता है। 2025 में जो कटाव हुआ था, उसकी यादें अभी ताजी हैं। लोगों को डर है कि इस बार क्या होगा। क्या तटबंध टूट जाएगा? क्या और घर गंगा में समा जाएंगे? क्या और परिवार विस्थापित हो जाएंगे? इस डर के कारण गांव में एक अनिश्चितता का माहौल है। वही कुल मिलाकर देखे तो, जवैनिया गांव में कटाव का संकट, राहत कार्यों की पारदर्शिता, और नेताओं की बयानबाजी—तीनों ही मुद्दे एक साथ चर्चा के केंद्र में बने हुए हैं।

