Deepak Prakash: संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति सरकार में मंत्री पद पर आसीन है और वह विधानमंडल के किसी भी सदन का सदस्य नहीं है, तो उसे छह महीने के भीतर किसी न किसी सदन की सदस्यता ग्रहण करनी होती है।
- हाइलाइट: Deepak Prakash
- पूरी राज्य की नजरें एनडीए की अगली चाल और इस राजनीतिक पहेली के समाधान पर टिकी हुई हैं
पटना। बिहार की राजनीति में इन दिनों विधान परिषद के चुनाव को लेकर सरगर्मियां तेज हैं। नौ सीटों पर होने वाले इस चुनाव और एक सीट पर उपचुनाव के लिए भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड ने अपने-अपने पत्ते खोल दिए हैं। एनडीए की तरफ से आठ उम्मीदवारों के नामों की घोषणा के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। इस घोषणा के बाद सबसे बड़ा झटका राष्ट्रीय लोक मोर्चा के प्रमुख और केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश को लगा है। वर्तमान राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए अब यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या दीपक प्रकाश को अपने मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ेगा।
मौजूदा स्थिति पर गौर करें तो बिहार विधान परिषद की सदस्यता के लिए गणित पूरी तरह से स्पष्ट है। किसी भी एक उम्मीदवार को जीत सुनिश्चित करने के लिए विधानसभा के 25 सदस्यों के समर्थन की आवश्यकता होती है। एनडीए के पास वर्तमान में जो संख्याबल है, उसके अनुसार वे आठ सीटों पर जीत हासिल करने में सक्षम हैं। यदि हम घटक दलों की बात करें तो भाजपा के पास 89, जदयू के पास 85, लोजपा (रामविलास) के पास 19, हम के पास 5 और राष्ट्रीय लोक मोर्चा के पास केवल 4 विधायक हैं। एनडीए के भीतर सीटों के इस बंटवारे के बीच दीपक प्रकाश के लिए राह बेहद कठिन नजर आ रही है।
Deepak Prakash : दीपक प्रकाश की राह क्यों हुई मुश्किल?
दीपक प्रकाश के लिए मुश्किलें यहीं खत्म नहीं होतीं। विधान परिषद चुनाव के नियमों के तहत एक उम्मीदवार को नामांकन दाखिल करने के लिए कम से कम 10 प्रस्तावकों की आवश्यकता होती है, जो कि अनिवार्य रूप से विधानसभा सदस्य होने चाहिए। दीपक प्रकाश की पार्टी के पास केवल 4 विधायक हैं, जो नामांकन के लिए आवश्यक संख्या से काफी कम हैं। ऐसी स्थिति में एनडीए के भीतर से उन्हें नौवां उम्मीदवार बनाए जाने की संभावना भी फिलहाल बेहद क्षीण दिखाई देती है। यदि एनडीए उन्हें उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतारने का जोखिम उठाता भी है, तो उन्हें जीत के लिए विपक्ष यानी राजद और कांग्रेस के खेमे में बड़ी टूट का इंतजार करना पड़ेगा।
राजनीति में संभावनाओं के दरवाजे कभी पूरी तरह बंद नहीं होते। बिहार में हाल ही में हुए राज्यसभा चुनाव का उदाहरण हमारे सामने है, जहां विपक्षी महागठबंधन के 41 विधायक होने के बावजूद उनके उम्मीदवार को हार का सामना करना पड़ा था। उस दौरान क्रॉस वोटिंग की खबरों ने राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया था और भाजपा के शिवेश राम अपनी जीत सुनिश्चित करने में सफल रहे थे। संभव है कि दीपक प्रकाश के समर्थक इसी तरह के किसी उलटफेर की उम्मीद लगाए बैठे हों, लेकिन वर्तमान गणित उन्हें एक कठिन परीक्षा में डालता दिख रहा है।
छह महीने के भीतर सदन की सदस्यता अनिवार्य
संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति सरकार में मंत्री पद पर आसीन है और वह विधानमंडल के किसी भी सदन का सदस्य नहीं है, तो उसे छह महीने के भीतर किसी न किसी सदन की सदस्यता ग्रहण करनी होती है। यदि दीपक प्रकाश विधान परिषद के लिए चुने नहीं जाते हैं, तो उनके सामने पद छोड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा।
आने वाले दिनों में यह स्पष्ट हो जाएगा कि एनडीए नेतृत्व दीपक प्रकाश को सुरक्षित निकालने के लिए क्या कोई नई रणनीति तैयार करता है। इस मामले का समाधान ही यह तय करेगा कि एनडीए बिहार में कितने एकजुट होकर आगे बढ़ता है। फिलहाल, पूरी राज्य की नजरें एनडीए की अगली चाल और इस राजनीतिक पहेली के समाधान पर टिकी हुई हैं।

