Bihar MLA: बिहार की राजनीति और चुनाव में जीत के लिए पानी की तरह पैसा बहाने के चलन से लोकसभा और विधान सभा में गरीब सांसद और विधायक लगातार गायब हो रहे हैं।
- हाइलाइट: Bihar MLA
- पिछले कुछ दशकों में, बिहार की चुनावी राजनीति में धन की भूमिका सर्वोपरि
- चुनाव जीतने के लिए “पानी की तरह पैसा बहाने” का चलन
- सामाजिक न्याय, जातिगत समीकरण और जनसमर्थन का दौर हाशिए पर
Bihar MLA: बिहार, भारत के उन राज्यों में से एक है जहाँ राजनीति की जड़ें अत्यंत गहरी हैं। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आज तक, बिहार ने राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालाँकि, पिछले कुछ दशकों में, बिहार की चुनावी राजनीति एक ऐसे दौर से गुज़र रही है जहाँ धन की भूमिका सर्वोपरि हो गई है। चुनाव जीतने के लिए “पानी की तरह पैसा बहाने” का यह चलन इतना गहरा गया है कि इसने प्रदेश की विधानसभाओं से गरीब और सामान्य पृष्ठभूमि के जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति को लगभग समाप्त कर दिया है।
धनबल का बढ़ता प्रभाव: बिहार में चुनावी राजनीति का इतिहास उतार-चढ़ाव भरा रहा है। पहले जहाँ सामाजिक न्याय, जातिगत समीकरण और जनसमर्थन प्रमुख कारक होते थे, वहीं आज धनबल एक निर्णायक शक्ति बनकर उभरा है। विधानसभा और लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवारों को बड़ी मात्रा में धन की आवश्यकता होती है। चुनाव प्रचार, रैलियां, जनसभाएं, वोटरों को लुभाना, और अन्य खर्चों के लिए पैसों का भारी निवेश आम हो गया है। यह स्थिति उन उम्मीदवारों के लिए एक बड़ी बाधा बन जाती है जिनके पास पर्याप्त वित्तीय संसाधन नहीं हैं।
Bihar MLA : गरीब और सामान्य पृष्ठभूमि के जनप्रतिनिधि हाशिए पर
जब चुनाव लड़ने की लागत आसमान छूने लगती है, तो स्वाभाविक रूप से केवल वही लोग इस मैदान में उतर पाते हैं जिनके पास अकूत संपत्ति है या जो किसी बड़े राजनीतिक दल या अमीर प्रायोजक के समर्थन से खड़े होते हैं। इसका सीधा असर यह होता है कि ईमानदार, मेहनती और जनसेवा की भावना रखने वाले, लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के व्यक्ति राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने या चुनाव जीतने में असमर्थ हो जाते हैं। बिहार की विधानसभा में गरीब और मध्यम वर्ग के विधायकों की संख्या लगातार घटती जा रही है, जो लोकतंत्र के लिए एक गंभीर चिंता का विषय है।
धनबल के प्रभाव के कारण:
- चुनाव प्रचार की बढ़ती लागत: चुनाव आयोग द्वारा भले ही चुनाव खर्च की सीमा निर्धारित की गई हो, लेकिन वास्तविकता इससे कोसों दूर है। हेलीकॉप्टर से रैलियों को संबोधित करना, बड़े पैमाने पर होर्डिंग्स और बैनर लगाना, वाहन रैली निकालना, मतदाताओं तक पहुंचने के लिए हर स्तर पर व्यवस्था करना, मीडिया का सहारा लेना – इन सबमें भारी खर्च आता है। एक सामान्य उम्मीदवार के लिए यह लागत वहन करना असंभव सा हो जाता है।
- वोट खरीदने का चलन: दुर्भाग्यवश, बिहार सहित कई राज्यों में वोट खरीदने का चलन भी काफी प्रबल है। मतदाताओं को सीधे या परोक्ष रूप से प्रभावित करने के लिए धन का प्रयोग किया जाता है। यह एक ऐसी विकृति है जो निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया को कमजोर करती है और धनवानों को ही सत्ता में लाने का मार्ग प्रशस्त करती है।
- राजनीतिक दलों का रवैया: कई बार राजनीतिक दल भी ऐसे उम्मीदवारों को प्राथमिकता देते हैं जिनके पास चुनाव लड़ने के लिए पर्याप्त धन हो। ऐसे उम्मीदवारों से पार्टी को चुनाव खर्च जुटाने में मदद मिलती है और जीत की संभावना भी बढ़ जाती है। यह प्रवृत्ति गरीब और योग्य नेताओं के अवसरों को सीमित करती है।
- भ्रष्टाचार से कमाई का अवसर: एक बार जब कोई व्यक्ति धनबल के सहारे चुनाव जीत जाता है, तो अक्सर वह अपने निवेश को वसूलने और भविष्य के चुनावों के लिए और धन जुटाने के प्रयास में भ्रष्टाचार की ओर प्रवृत्त होता है। यह एक दुष्चक्र बन जाता है जहाँ राजनीति का अपराधीकरण और धन का अत्यधिक प्रभाव एक दूसरे को पोषित करते हैं।
लोकतंत्र पर प्रभाव: जब संसद और विधानसभाओं में केवल अमीर या धनवान लोग ही पहुँचेंगे, तो उनके द्वारा लिए गए निर्णय समाज के सभी वर्गों के हितों का प्रतिनिधित्व नहीं कर पाएंगे। गरीब और वंचित तबकों की समस्याओं, उनकी आकांक्षाओं और उनकी ज़रूरतों को शायद उतनी प्रमुखता न मिल पाए जितनी मिलनी चाहिए। यह लोकतंत्र के मूल सिद्धांत – “जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए” – के विपरीत है।
बिहार की राजनीति में पानी की तरह पैसा बहाने का चलन लोकतंत्र के स्वस्थ संचालन के लिए एक बड़ा खतरा है। यह न केवल गरीब और सामान्य पृष्ठभूमि के योग्य व्यक्तियों को राजनीति से दूर कर रहा है, बल्कि सत्ता के गलियारों को भ्रष्टाचार और धनबल के प्रभाव के अधीन भी बना रहा है। यदि लोकतंत्र को वास्तव में जन-केंद्रित रखना है, तो इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना अत्यंत आवश्यक है। इसके लिए सामूहिक प्रयास, राजनीतिक इच्छाशक्ति और नागरिक जागरूकता की आवश्यकता है ताकि बिहार की लोकसभा और विधानसभाओं में हर वर्ग का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सके, और वास्तविक जनसेवक सदन में पहुँच सकें।
राजनीति और चुनाव में जीत के लिए पानी की तरह पैसा बहाने के चलन से लोकसभा और विधान सभा में गरीब सांसद और विधायक लगातार गायब हो रहे हैं। देश-प्रदेश की राजनीति में कोई भी नेता अब गरीब नजर नहीं आता। बिहार विधानसभा की 243 सीटों के चुनाव में 218 करोड़पतियों (Bihar MLA) ने जीत हासिल की है। मात्र 25 विधायक ऐसे हैं, जिनकी संपत्ति एक करोड़ से कम है। पीरपैंती से भाजपा के टिकट पर जीते मुरारी पासवान सबसे गरीब विधायक हैं, जिनके पास कुल 6.53 लाख की संपत्ति है। मुंगेर से जीते बीजेपी के ही कुमार प्रणय सबसे अमीर विधायक हैं, जिनके पास पास 170 करोड़ की प्रॉपर्टी है। 243 नए विधायकों के पास कुल 2192 करोड़ की संपत्ति है।
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने चुनाव में दाखिल शपथ पत्रों का विश्लेषण करके विधायकों (Bihar MLA) की अमीरी-गरीबी की यह तस्वीर पेश की है। बिहार विधानसभा में 2010 में 20 फीसदी करोड़पति विधायक पहुंचे थे, जो 2015 में बढ़कर 67 फीसदी तक पहुंच गया। 2020 में इसमें और उछाल आया और 81 परसेंट करोड़पति विधायक पटना पहुंचे। 2025 में करोड़पतियों का अब तक का सारा रिकॉर्ड टूट गया है। बिहार विधानसभा पहुंचे 243 एमएलए में इस बार 90 फीसदी विधायक करोड़पति हैं। संख्या में बताएं तो 218 करोड़पति विधायक हैं, जिनके पास एक करोड़ या उससे भी ज्यादा की संपत्ति है। 243 विधायकों की औसत संपत्ति देखें तो वह 2010 के 82 लाख से बढ़कर 2025 में 9 करोड़ हो गई है। 2020 में औसत संपत्ति 4 करोड़ थी।
सबसे अमीर तीन विधायकों में 170 करोड़ की संपत्ति के मालिक बीजेपी के कुमार प्रणय के बाद मोकामा से जीते जेडीयू के अनंत सिंह का नाम है, जिनके पास 100 करोड़ की संपत्ति है। तीसरे सबसे अमीर नए विधायक हैं जेडीयू के डॉक्टर कुमार पुष्पंजय जो 94 करोड़ की प्रॉपर्टी के स्वामी हैं। सबसे गरीब तीन एमएलए की लिस्ट में मुरारी पासवान के बाद दो और विधायक भी भाजपा के ही हैं और तीनों ही एससी आरक्षित सीट से जीते दलित नेता हैं। अगिआंव से जीते महेश पासवान के पास 8.55 लाख और राजनगर से विजयी सुजीत कुमार के पास 11 लाख की संपत्ति है।
10 करोड़ से ऊपर की संपत्ति वाले 55 विधायक जीते हैं
बिहार के 218 करोड़पति विधायकों में 55 एमएलए की संपत्ति 10 करोड़ से ऊपर है। 10 करोड़ से 5 करोड़ की रेंज वाले 44 विधायक हैं। सबसे ज्यादा करोड़पति 1 करोड़ से 5 करोड़ के बीच में हैं, जिनकी संख्या 119 हैं। एक करोड़ से नीचे लेकिन 20 लाख से ऊपर संपत्ति वाले विधायकों की संख्या 21 है जबकि 20 लाख से कम पैसा वाले मात्र 4 विधायक ही सदन में पहुंच पाए हैं। मतलब लगभग आधे विधायक ऐसे हैं जिनके पास 1 से 5 करोड़ रुपये की संपत्ति है।
जेडीयू सबसे आगे; कांग्रेस, AIMIM और रालोमो के सारे विधायक करोड़पति
करोड़पति विधायकों की दलीय स्थिति देखें तो सबसे ज्यादा 78 करोड़पति नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू के हैं, जिनके 85 नेता एमएलए बने हैं। बीजेपी के जीते 89 विधायकों में 77 करोड़पति हैं। लालू और तेजस्वी यादव की राजद के 25 में 24 विधायक करोड़पति हैं। चिराग पासवान की पार्टी एलजेपी-आर के 19 में 16 एमएलए करोड़पति हैं। जीतनराम मांझी की हम के 5 में से 4 विधायक करोड़पति हैं। सीपीआई-एमएल के 2 में 1 विधायक करोड़पति हैं। इनके अलावा बाकी सभी दलों के सारे विधायक करोड़पति ही हैं। इनमें कांग्रेस के 6, असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम के 5, उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएम के 4, सीपीएम के 1, आईपी गुप्ता की पार्टी आईआईपी से खुद गुप्ता, मायावती की बीएसपी से 1 विधायक शामिल हैं।


