Dhritrashtra: शिवानंद तिवारी ने लालू यादव को महाभारत के पात्र धृतराष्ट्र की तरह बताया है, जो अपने पुत्रमोह में अंधे होकर राज्य के भविष्य को दांव पर लगा रहे थे। यह काफी अजीब है।
- हाइलाइट: Dhritrashtra
- बेटे के चुनाव हारते ही बाबा ने शुरू की कहानिया, शिवानंद तिवारी ने लालू प्रसाद यादव को दी धृतराष्ट्र की संज्ञा
Dhritrashtra: बिहार की राजनीति में इन दिनों एक अजीब सी सरगर्मी है। हार और जीत यह सिर्फ़ बिहार तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय राजनीति का एक ऐसा पहलू है जो अक्सर देखने को मिलता है। लेकिन राजद में अब एक नया मोड़ सामने आया है, वरिष्ठ समाजवादी नेता और पूर्व मंत्री शिवानंद तिवारी ने राष्ट्रीय जनता दल (राजद) सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव पर तीखा प्रहार किया है। उनके बेटे तेजस्वी प्रसाद यादव के बिहार विधानसभा चुनाव में बड़ी हार के बाद, तिवारी ने लालू यादव को महाभारत के पात्र धृतराष्ट्र (Dhritrashtra) के समान बताया है, जो अपने पुत्रमोह में अंधे होकर राज्य के भविष्य को दांव पर लगा रहे थे। यह काफी अजीब है।
बता दें की धृतराष्ट्र, महाभारत के एक ऐसे राजा थे जो अपने पुत्र मोह में अंधे होकर सत्य और धर्म के मार्ग से भटक गए थे। तिवारी का यह कहना कि लालू यादव भी अपने बेटे के प्रति इसी तरह के मोह में डूबे हुए हैं, एक गंभीर आरोप है। शिवानंद तिवारी जैसे वरिष्ठ नेता द्वारा इस तरह की सार्वजनिक टिप्पणी, यह बताता है कि पार्टी के भीतर भी असंतोष और मतभेद मौजूद हैं, जो समय-समय पर सतह पर आ जाते हैं। तिवारी के इस बयान ने बिहार की राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है।
अपने बयान में शिवानंद तिवारी ने लालू प्रसाद यादव के साथ बिताए जेल के दिनों की यादें ताजा कीं, जब वे दोनों बिहार आंदोलन के दौरान फुलवारी शरीफ़ जेल में एक ही कमरे में बंद थे। तिवारी ने बताया कि उस आंदोलन का चेहरा भले ही लालू यादव थे, लेकिन उनकी महत्वाकांक्षाएँ सीमित थीं। तिवारी के अनुसार, रात में सोने के समय लालू यादव ने उनसे अपने भविष्य के सपनों को साझा किया था। “बाबा, मैं राम लखन सिंह यादव जैसा नेता बनना चाहता हूँ,” लालू ने कहा था। तिवारी ने इस बात पर भी आश्चर्य व्यक्त किया कि कैसे कभी-कभी ऊपर वाला सुन लेता है और उनकी वह इच्छा पूरी हो गई।
तिवारी ने इस चुनाव में राजद की दयनीय स्थिति पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पूरे परिवार ने ज़ोर लगाया, लेकिन पार्टी के मात्र पच्चीस विधायक ही जीत पाए। यह आँकड़ा राजद जैसी पुरानी और प्रभावशाली पार्टी के लिए निश्चित रूप से निराशाजनक है। इसके बाद, तिवारी ने अपने स्वयं के पार्टी उपाध्यक्ष पद से हटाए जाने पर भी बात की। उन्होंने कहा, “मन में यह सवाल उठ सकता है कि मैं तो स्वयं उस पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष था। उसके बाद ऐसी बात मैं क्यों कह रहा हूँ!” तिवारी ने स्पष्ट किया कि यह अतीत की बात है। उन्होंने बताया कि तेजस्वी यादव ने न केवल उन्हें उपाध्यक्ष पद से हटाया, बल्कि कार्यकारिणी में भी जगह नहीं दी।
इसका कारण बताते हुए तिवारी ने कहा कि वे मतदाता सूची के सघन पुनर्निरीक्षण को लोकतंत्र के विरुद्ध साजिश बता रहे थे। उन्होंने राहुल गांधी के साथ सड़क पर उतरकर संघर्ष करने, पुलिस की मार खाने और जेल जाने की वकालत की थी। तिवारी के अनुसार, तेजस्वी यादव उस समय सपनों की दुनिया में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के ख्वाब देख रहे थे। तिवारी ने उन्हें झकझोरने और उनके सपनों में विघ्न डालने का प्रयास किया।
इसी संदर्भ में, तिवारी ने लालू प्रसाद यादव पर निशाना साधते हुए कहा, “लालू यादव धृतराष्ट्र (Dhritrashtra) की तरह बेटे के लिए राज सिंहासन को गर्म कर रहे थे।” यह तुलना अत्यंत गंभीर है और लालू यादव के पुत्रमोह तथा उनके द्वारा तेजस्वी यादव को आगे बढ़ाने की प्रवृत्ति पर सीधा आरोप है। महाभारत में धृतराष्ट्र अपने पुत्र दुर्योधन के मोह में पड़कर पांडवों के अधिकारों का हनन करते रहे, जिसका परिणाम अंततः विनाशकारी सिद्ध हुआ। तिवारी के इस बयान से यह आशय निकलता है कि लालू यादव भी अपने बेटे के प्रति अत्यधिक मोह के कारण पार्टी और बिहार के हित को अनदेखा करते रहे।
शिवानंद तिवारी ने अपने बयान का अंत इस बात से किया कि अब वे पार्टी के पदों से मुक्त हो चुके हैं। उन्होंने कहा की अब मैं मुक्त हो चुका हूँ। फुरसत पा चुका हूँ। अब कहानियाँ सुनाता रहूँगा।” इससे यह संकेत मिलता है कि तिवारी अब राजद के आंतरिक मामलों से खुद को अलग मानते हैं और अपनी बातों को खुलकर रखने के लिए स्वतंत्र हैं। उनका यह बयान, जिसमें उन्होंने लालू यादव की तुलना धृतराष्ट्र (Dhritrashtra) से की है, निश्चित रूप से राजद के भीतर और बाहर चर्चा का विषय बनेगा।
क्या कहा शिवानंद तिवारी ने पूरी बात जाने ?
शिवानंद तिवारी ने कहा की बिहार आंदोलन के दौरान लालू यादव और मैं फुलवारी शरीफ़ जेल के एक ही कमरे में बंद थे. लालू यादव उस आंदोलन का बड़ा चेहरा थे. लेकिन उनकी आकांक्षा बहुत छोटी थी. रात में भोजन के बाद सोने के लिए जब हम अपनी अपनी चौकी पर लेटे थे तब लालू यादव ने अपने भविष्य के सपने को मुझसे साझा किया था.
लालू ने मुझसे कहा कि ‘बाबा, मैं राम लखन सिंह यादव जैसा नेता बनना चाहता हूँ ‘. लगता है कि कभी कभी-ऊपर वाला शायद सुन लेता है. आज दिखाई दे रहा है कि उनकी वह इच्छा पूरी हो गई है. संपूर्ण परिवार ने ज़ोर लगाया. उनकी पार्टी के मात्र पच्चीस विधायक ही जीते.
मन में यह सवाल उठ सकता है कि मैं तो स्वयं उस पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष था. उसके बाद ऐसी बात मैं क्यों कह रहा हूँ ! मैं राष्ट्रीय उपाध्यक्ष था. यह अतीत की बात हो गई. तेजस्वी ने मुझे न सिर्फ़ उपाध्यक्ष से हटाया बल्कि कार्यकारिणी में भी जगह नहीं दी. ऐसा क्यों ?
क्योंकि मैं कह रहा था कि मतदाता सूची का सघन पुनर्निरीक्षण लोकतंत्र के विरूद्ध साज़िश है. इसके खिलाफ राहुल गांधी के साथ सड़क पर उतरो. संघर्ष करो. पुलिस की मार खाओ. जेल जाओ. लेकिन वह तो सपनों की दुनिया में मुख्यमंत्री का शपथ ले रहा था. उसको झकझोर कर उसके सपनों में मैं विघ्न डाल रहा था. लालू यादव धृतराष्ट्र की तरह बेटे के लिए राज सिंहासन को गर्म कर रहे थे. अंत में तिवारी ने कहा की अब मैं मुक्त हो चुका हूँ. फुरसत पा चुका हूँ. अब कहानियाँ सुनाता रहूँगा।



