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दुनिया को अलविदा कह हमेशा के लिए ओझल हो गये प्रख्यात शायर पद्मश्री बशीर बद्र

“कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, यूं कोई बेवफा नहीं होता”

Bashir Badr: बशीर बद्र की शायरी रिश्तों की संवेदनशीलता, तन्हाई, मोहब्बत और जीवन की वास्तविकताओं का आईना थी। उनके शेर न केवल सुनने में सरल थे, बल्कि जीवन के गहरे अर्थों को भी समाहित करते थे।

  • हाइलाइट: Bashir Badr के लोकप्रिय शेर
  • “कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, यूं कोई बेवफा नहीं होता”
  • “लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में”
  • “कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से, ये नए मिजाज का शहर है, जरा फासले से मिला करो”

Bashir Badr: उर्दू अदब के फलक पर एक चमकता हुआ सितारा हमेशा के लिए ओझल हो गया। अपनी सादगी भरी और दिल को छू लेने वाली शायरी से करोड़ों लोगों के दिलों में बसने वाले प्रख्यात शायर पद्मश्री बशीर बद्र का निधन हो गया है। उन्होंने गुरुवार को भोपाल स्थित अपने आवास पर 91 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली। उनके निधन से उर्दू साहित्य और शायरी की दुनिया को एक अपूरणीय क्षति हुई है, जिसका असर हर उस व्यक्ति पर है जो उनके शब्दों की गहराई और सादगी का कायल रहा है।

बशीर बद्र पिछले काफी समय से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं, विशेषकर डिमेंशिया से जूझ रहे थे, जिसके कारण उनकी याददाश्त काफी कमजोर हो गई थी। उनके जाने से साहित्य जगत में एक सन्नाटा सा पसर गया है। उनके चाहने वाले उन्हें याद करते हुए कहते हैं कि आज उर्दू जुबान का एक बेहद नरम और संजीदा लहजा खामोश हो गया है। उनकी शायरी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने जटिल शब्दों के बजाय आम बोलचाल की भाषा का उपयोग किया, जिससे उनकी रचनाएँ हर वर्ग के पाठक के दिल तक सीधी पहुँच गईं।

Bashir Badr : अयोध्या में जन्मे सैयद मोहम्मद बशीर

15 फरवरी 1935 को अयोध्या में जन्मे सैयद मोहम्मद बशीर, जो बाद में बशीर बद्र के नाम से विश्व प्रसिद्ध हुए, ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की। मेरठ कॉलेज में उर्दू के प्रोफेसर के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने न केवल छात्रों को शिक्षित किया, बल्कि अपनी गजलों के माध्यम से देश-दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बनाई। सत्तर और अस्सी के दशक में उनकी गजलों ने पाठकों के बीच गहरी छाप छोड़ी थी।

बशीर बद्र की शायरी रिश्तों की संवेदनशीलता, तन्हाई, मोहब्बत और जीवन की वास्तविकताओं का आईना थी। उनके शेर न केवल सुनने में सरल थे, बल्कि जीवन के गहरे अर्थों को भी समाहित करते थे। उदाहरण के लिए, “कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, यूं कोई बेवफा नहीं होता” जैसे शेरों ने टूटे हुए दिलों को एक नई भाषा दी। वहीं, आधुनिक समाज के बदलते मिजाज और रिश्तों में आई दूरियों पर उनकी टिप्पणी “कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से, ये नए मिजाज का शहर है, जरा फासले से मिला करो” आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।

मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक सरोकारों पर उनके तीखे कटाक्ष

समाज के प्रति उनका दृष्टिकोण भी उनकी शायरी में स्पष्ट झलकता था। मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक सरोकारों पर उन्होंने तीखे कटाक्ष भी किए, जो समाज की बेरुखी पर चोट करते थे। “लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में” जैसा शेर समाज की कठोर सच्चाइयों को बयां करता है।

वर्ष 1999 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया, जो उनके साहित्यिक योगदान की एक बानगी भर था। बशीर बद्र का असली सम्मान उन करोड़ों पाठकों के दिलों में है, जिन्होंने उनकी गजलों को अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाया। उनके निधन से उपजे इस शून्य को भर पाना कठिन है। उन्होंने अपनी गजलों और शेरों के माध्यम से जो विरासत छोड़ी है, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा मार्गदर्शन और प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी। उर्दू अदब उन्हें हमेशा उनकी सादगी, उनके गहरे जज्बातों और उनके बेमिसाल अंदाज के लिए याद रखेगा।

RAVI KUMAR
RAVI KUMAR
बिहार के भोजपुर जिला निवासी रवि कुमार एक भारतीय पत्रकार है एवं न्यूज पोर्टल खबरे आपकी के प्रमुख लोगों में से एक है।
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