Re-admission fees: पूर्व विधायक भाई दिनेश ने कहा कि शिक्षा किसी भी सभ्य समाज की नींव होती है और इसे केवल व्यापार का माध्यम नहीं बनने देना चाहिए।
- हाइलाइट: Re-admission fees
- निजी स्कूलों द्वारा अभिभावकों का हो रहा आर्थिक शोषण: भाई दिनेश
आरा। शिक्षा किसी भी समाज की आधारशिला होती है और इसका उद्देश्य ज्ञान का प्रसार, व्यक्तित्व का विकास तथा भविष्य की पीढ़ी का निर्माण करना है। भारत में, सरकारी स्कूलों के साथ-साथ निजी स्कूलों ने भी शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालांकि, हाल के वर्षों में निजी स्कूलों की बढ़ती संख्या के साथ, कुछ ऐसी प्रवृत्तियां भी देखने को मिली हैं जो अभिभावकों के लिए चिंता का विषय बन गई हैं। इनमें से सबसे प्रमुख मुद्दा निजी स्कूलों द्वारा विभिन्न शुल्कों के नाम पर किया जा रहा आर्थिक शोषण है, जिस पर राजद नेता और जगदीशपुर, भोजपुर के पूर्व विधायक भाई दिनेश ने माननीय मुख्यमंत्री, बिहार सरकार का ध्यान आकर्षित किया है। उन्होंने इस गंभीर समस्या पर तत्काल रोक लगाने की मांग की है।
भाई दिनेश ने कहा कि जगदीशपुर, भोजपुर सहित संपूर्ण बिहार में हजारों निजी स्कूल खुले हैं जो प्रतिवर्ष ‘री-एडमिशन’ के नाम पर अभिभावकों का आर्थिक शोषण कर रहे हैं, जो पूर्णतः गलत है। यह मुद्दा केवल एक शुल्क तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके दायरे में कई अन्य मनमानी प्रथाएं भी शामिल हैं, जो अभिभावकों की जेब पर भारी पड़ रही हैं और शिक्षा को एक महंगा सौदा बना रही हैं।
शिक्षा किसी भी सभ्य समाज की नींव होती है और इसे केवल व्यापार का माध्यम नहीं बनने देना चाहिए। निजी स्कूलों की मनमानी और अभिभावकों का आर्थिक शोषण न केवल परिवारों को प्रभावित करता है बल्कि शिक्षा के मूल उद्देश्य को भी कमजोर करता है। यह समय है जब सरकार, अभिभावक और समाज मिलकर इस चुनौती का सामना करें और यह सुनिश्चित करें कि शिक्षा सभी के लिए सुलभ, न्यायसंगत और गुणवत्तापूर्ण हो, न कि शोषण का जरिया। बिहार को एक ऐसी शिक्षा प्रणाली की आवश्यकता है जो समावेशी हो, हर बच्चे को समान अवसर प्रदान करे और उनके उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करे, न कि अभिभावकों पर अनावश्यक वित्तीय बोझ डाले।
- री-एडमिशन शुल्क का अनुचित बोझ:
यह सबसे बड़ी और तर्कहीन प्रथाओं में से एक है। जब एक बच्चा पहली कक्षा या नर्सरी में किसी स्कूल में दाखिला लेता है, तो वह उस स्कूल का पंजीकृत छात्र बन जाता है। ऐसे में हर वर्ष उसके अभिभावकों से ‘री-एडमिशन’ के नाम पर पैसा वसूलना पूरी तरह से अनुचित है। यह शुल्क आमतौर पर नए प्रवेश शुल्क के बराबर या उसके करीब होता है, जिसका अर्थ है कि अभिभावकों को हर साल अपने बच्चे का ‘नया दाखिला’ करवाना पड़ रहा है। यह एक स्पष्ट विरोधाभास है और केवल अतिरिक्त राजस्व कमाने का एक तरीका है। यह प्रथा शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन करती है और अभिभावकों पर अनावश्यक वित्तीय दबाव डालती है। - कई तरह के ‘छिपे हुए’ और मनमाने शुल्क:
री-एडमिशन शुल्क के अलावा, निजी स्कूल प्रबंधन कई तरह के अन्य शुल्क भी वसूलते हैं जैसे कि वार्षिक शुल्क, विकास शुल्क, कंप्यूटर शुल्क, खेल शुल्क, इवेंट शुल्क, परीक्षा शुल्क आदि। इन शुल्कों की पारदर्शिता अक्सर संदिग्ध होती है, और अभिभावकों को अक्सर यह समझ में नहीं आता कि ये शुल्क किस उद्देश्य के लिए लिए जा रहे हैं। कई बार ये शुल्क बिना किसी स्पष्ट औचित्य के बढ़ा दिए जाते हैं, जिससे अभिभावकों को अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा शिक्षा पर खर्च करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। - हर वर्ष किताबों और ड्रेस का परिवर्तन तथा विशेष दुकान से खरीदारी का दबाव:
भाई दिनेश ने इस बात पर भी जोर दिया कि निजी स्कूल हर वर्ष किताबों का पाठ्यक्रम बदल देते हैं। इसके साथ ही, अभिभावकों पर यह दबाव बनाया जाता है कि वे किताबें, बैग और ड्रेस स्कूल प्रबंधक द्वारा संचालित या किसी विशेष दुकान से ही खरीदें। यह प्रथा एक सुनियोजित व्यापारिक रणनीति प्रतीत होती है, जहाँ स्कूल प्रबंधन और पुस्तक/ड्रेस विक्रेताओं के बीच गठजोड़ होता है। इससे अभिभावक अपनी पसंद की या बाजार में उपलब्ध सस्ती किताबें और ड्रेस खरीदने से वंचित रह जाते हैं और उन्हें अधिक कीमत चुकानी पड़ती है। एक समान पाठ्यक्रम या ड्रेस कोड न होने के कारण भी अभिभावकों को हर साल नए सिरे से भारी खर्च करना पड़ता है। यह न केवल आर्थिक बोझ डालता है, बल्कि प्रतिस्पर्धा को भी समाप्त करता है। - सरकारी नियंत्रण का अभाव और नीतिगत शून्य:
भाई दिनेश के अनुसार, प्रदेश के अंदर हजारों स्कूलों का हजारों तरह के एडमिशन फीस, ड्रेस और पाठ्यक्रम चलाना यह स्पष्ट रूप से साबित करता है कि सरकार का निजी स्कूलों पर या तो नियंत्रण नहीं है, या फिर वह आम आदमी के विषय में कोई चिंता नहीं करती है। यह एक गंभीर आरोप है, लेकिन इसमें सच्चाई का अंश भी दिखाई देता है। शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में मनमानी पर अंकुश लगाने के लिए मजबूत नियामक तंत्र का अभाव साफ झलकता है। यदि सरकार हस्तक्षेप न करे, तो निजी स्कूल अपनी शर्तों पर काम करते रहेंगे, जिससे अभिभावक शोषण का शिकार होते रहेंगे।
अभिभावकों पर प्रभाव और सामाजिक परिणाम:
यह आर्थिक शोषण मध्यम और निम्न-मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए शिक्षा को एक विलासिता बना रहा है। कई अभिभावकों को अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा प्रदान करने के लिए कर्ज लेना पड़ता है या अन्य आवश्यक घरेलू खर्चों में कटौती करनी पड़ती है। यह स्थिति शैक्षिक असमानता को बढ़ावा देती है, जहाँ आर्थिक रूप से कमजोर बच्चे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित रह जाते हैं। अभिभावकों में तनाव और निराशा बढ़ती है, क्योंकि वे खुद को इस व्यवस्था का शिकार पाते हैं और असहाय महसूस करते हैं। यह अंततः समाज में विभाजन और असंतोष पैदा करता है।
भाई दिनेश ने कहा कि माननीय मुख्यमंत्री को इस गंभीर मुद्दे पर तत्काल ध्यान देना चाहिए। सरकार को निजी स्कूलों द्वारा ‘री-एडमिशन’ शुल्क वसूलने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना चाहिए। फीस निर्धारण और अन्य शुल्कों में पूर्ण पारदर्शिता लाने के लिए एक स्पष्ट और सख्त नीति बनाई जाए। इस नीति में फीस वृद्धि पर नियंत्रण, शुल्कों का स्पष्ट वर्गीकरण और उनके औचित्य का प्रावधान होना चाहिए। किताबों और ड्रेस के लिए एक समान पाठ्यक्रम और कोड विकसित किया जाए, और स्कूलों को अभिभावकों पर किसी विशेष दुकान से खरीदारी का दबाव बनाने से रोका जाए। भाई दिनेश ने बहुत जल्द इस मुद्दे पर धरना प्रदर्शन करने की घोषणा की है। भाई दिनेश ने अभिभावक बंधुओं से इस लड़ाई में अपना योगदान देने का निवेदन किया है।


