Bihar dignity: प्रशांत किशोर ने भाजपा के चाल, चरित्र और चेहरा पर तंज कसते हुए कहा कि जो पार्टी खुद को आदर्शवादी होने का दावा करती है, उसका वर्तमान आचरण सवालों के घेरे में है।
- हाइलाइट: Bihar dignity
- प्रशांत किशोर ने इसे ‘बाहरी नियंत्रण’ बनाम ‘बिहार के स्वाभिमान’ से जोड़ा
- कहा: सत्ता की बागडोर अब पटना के बजाय दिल्ली और गांधीनगर में केंद्रित
- प्रशांत किशोर ने बिहार के राजनीतिक स्वाभिमान के लिए एक बड़ा संकट बताया
पटना। बिहार की राजनीतिक हलचल के बीच जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने राज्य के नेतृत्व परिवर्तन और भाजपा की कार्यशैली पर बेहद तीखे प्रहार किए हैं। सम्राट चौधरी को महत्वपूर्ण भूमिका दिए जाने के घटनाक्रम के बाद प्रशांत किशोर ने इस पूरे परिदृश्य को बिहार के आत्मसम्मान और राज्य की स्वायत्तता से जोड़ते हुए एक गंभीर बहस छेड़ दी है।
Bihar dignity: भाजपा के चाल, चरित्र और चेहरा पर तंज
प्रशांत किशोर ने भाजपा के चाल, चरित्र और चेहरा पर तंज कसते हुए कहा कि जो पार्टी खुद को आदर्शवादी होने का दावा करती है, उसका वर्तमान आचरण सवालों के घेरे में है। उन्होंने कहा कि भाजपा जिस तरह का नेतृत्व बिहार को दे रही है, वह राज्य की गरिमा और राजनीतिक नैतिकता के विपरीत है। किशोर का मानना है कि यह बदलाव किसी सकारात्मक परिवर्तन के लिए नहीं, बल्कि बाहरी प्रभाव को अधिक मजबूत करने के लिए किया गया है।
बिहार के राजनीतिक स्वाभिमान के लिए एक बड़ा संकट
प्रशांत किशोर ने इस बात पर जोर दिया कि बिहार में कौन व्यक्ति सत्ता के शीर्ष पर बैठा है, यह चर्चा का गौण विषय होना चाहिए। उनका मुख्य आरोप यह है कि सत्ता की वास्तविक बागडोर पटना के बजाय दिल्ली और गांधीनगर में केंद्रित है। किशोर ने सीधे तौर पर कहा कि नवनियुक्त नेतृत्व की डोर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के हाथों में होगी। उनके अनुसार, यह नई भाजपा का वह स्वरूप है जहाँ राज्यों के स्थानीय नेतृत्व को दरकिनार कर बाहरी दिशा-निर्देशों के आधार पर सरकारें चलाई जा रही हैं। उन्होंने इसे बिहार के राजनीतिक स्वाभिमान के लिए एक बड़ा संकट करार दिया।
बिहार के आर्थिक भविष्य को लेकर चिंता
प्रशांत किशोर ने केवल राजनीतिक नियंत्रण पर ही नहीं, बल्कि बिहार के आर्थिक भविष्य को लेकर भी गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा की सोची-समझी रणनीति के तहत बिहार के युवाओं को पलायन के लिए विवश किया जा रहा है। किशोर ने दावा किया कि भाजपा चाहती है कि बिहार के संसाधन और युवा शक्ति केवल सस्ते श्रम के रूप में दूसरे राज्यों, विशेषकर गुजरात के औद्योगिक घरानों की सेवा में समर्पित रहें। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि यह स्थिति जारी रही, तो आने वाले समय में बिहार के लोग अपने ही देश में मालिक बनने के बजाय दूसरे राज्यों में मजदूर बनकर रहने को अभिशप्त होंगे।
प्रशांत किशोर ने इसे ‘बाहरी नियंत्रण’ बनाम ‘बिहार के स्वाभिमान’ की लड़ाई बताया
प्रशांत किशोर के इन बयानों ने बिहार की राजनीति में एक नया ध्रुवीकरण पैदा कर दिया है। जहाँ एक तरफ सत्ता परिवर्तन को लेकर अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ किशोर ने इसे ‘बाहरी नियंत्रण’ बनाम ‘बिहार के स्वाभिमान’ की लड़ाई के रूप में पेश करके जनता के बीच एक नई चर्चा को जन्म दिया है। यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले समय में जनता और अन्य राजनीतिक दल इस नैरेटिव को किस रूप में स्वीकार करते हैं।


