Classical music Ara: बिहार की ऐतिहासिक धरती आरा की विशिष्ट पहचान शास्त्रीय संगीत के प्रमुख केंद्र के रूप में भी रही है।
- हाइलाइट: Classical music Ara
- भावभीनी श्रद्धांजलि : स्व. बक्शी ने संगीत साधना, कला के दीप को बुझने नहीं दिया
- आरा की सांस्कृतिक विरासत और संगीत साधना का स्वर्णिम इतिहास:
आरा,भोजपुर। बिहार की ऐतिहासिक धरती आरा की विशिष्ट पहचान शास्त्रीय संगीत के प्रमुख केंद्र के रूप में भी रही है। समय के अंतराल में यहाँ हुई संगीत की विविध गतिविधियाँ और कला के प्रति यहाँ के लोगों का समर्पण आरा शहर को एक सांस्कृतिक ऊँचाई प्रदान करता है। इस गौरवशाली परंपरा को संजोने में आरा के संगीत द्वारकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है, जिन्होंने कला के इस दीप को बुझने नहीं दिया।
आरा में आयोजित एक भावपूर्ण संगीत संध्या में इन स्मृतियों को ताजा किया गया। यह आयोजन स्व. बक्शी अवधेश कुमार श्रीवास्तव की पुण्य स्मृति में समर्पित था, जिन्होंने आरा की संगीत परंपरा को संवारने में अपना अमूल्य योगदान दिया। ज्ञात हो कि स्व. बक्शी जी ने लगभग 35 वर्षों तक आरा के सुप्रसिद्ध श्री कृष्ण जन्मोत्सव संगीत समारोह का सफलतापूर्वक आयोजन किया, जिससे यहाँ की संगीत संस्कृति निरंतर समृद्ध होती रही।
इस कार्यक्रम का उद्घाटन सुविख्यात तबला वादक डॉ. लाल बाबू निराला द्वारा किया गया। अपने संबोधन में डॉ. निराला ने आरा की संगीत विरासत की सराहना करते हुए कहा कि आरा का अपना एक स्वर्णिम इतिहास है और स्व. अवधेश कुमार श्रीवास्तव जैसे समर्पित व्यक्तियों ने ही इस विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का कार्य किया है। इस अवसर पर डॉ. निराला ने स्वतंत्र तबला वादन की प्रस्तुति दी, जिसने उपस्थित श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
Classical music Ara : संगीतद्वारकों के आभाव का शास्त्रीय संगीत पर प्रभाव
कार्यक्रम के दौरान गुरु बक्शी विकास ने एक गंभीर विषय की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि वर्तमान समय में आरा में संगीत के कद्रदानों की कमी महसूस की जा रही है। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि जिस प्रकार से संगीत द्वारकों का अभाव हो रहा है, उसका सीधा प्रभाव शास्त्रीय संगीत के संरक्षण और विकास पर पड़ रहा है। यह एक ऐसा प्रश्न है जिस पर कला प्रेमियों को गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है, ताकि शास्त्रीय संगीत की यह धारा अविरल बहती रहे।
सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के क्रम में गायिका श्रेया पांडेय ने अपनी सुरीली आवाज से समां बांध दिया। उन्होंने गजल नियत-ए-शौक भर ना जाए कहीं तथा सलोना सा सजन है और मैं हूँ जैसे गजलों की प्रस्तुति देकर दर्शकों का मन जीत लिया। वहीं, नन्ही नृत्यांगना शिवाक्षी ने रोको न डगर मोर श्याम पर अपनी मनोहारी नृत्य प्रस्तुति के माध्यम से राधा और कृष्ण की प्रेममयी नोक-झोंक को सजीव कर दिया।
शास्त्रीय नृत्य की विधाओं को आगे बढ़ाते हुए डॉ. ट्विंकल केशरी और स्मिता सिंह ने कथक के माध्यम से अपनी कला का प्रदर्शन किया। उन्होंने माँ दुर्गा की स्तुति से कार्यक्रम की शुरुआत की और तीन ताल में उपज, ठाट, आमद व परन के साथ-साथ मीरा के भजन पर आधारित भाव अभिनय प्रस्तुत कर उपस्थित जनसमूह से खूब तालियां बटोरीं। चाँदनी और माही ने भी राग आधारित संगीत की प्रस्तुति देकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।
कार्यक्रम का संचालन आदित्या श्रीवास्तव ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन गुरु बक्शी विकास द्वारा किया गया। आरा की यह संगीत संध्या न केवल स्व. बक्शी अवधेश कुमार श्रीवास्तव को एक भावभीनी श्रद्धांजलि थी, बल्कि यह शहर के उस सांस्कृतिक गौरव को भी स्मरण कराने का एक प्रयास था।


