Anchal Ranking: सरकार की ओर से जुलाई माह में अंचलों के कामकाज के आधार पर जारी की गई रैंकिंग ने भोजपुर के कई अंचलों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
- हाइलाइट: Anchal Ranking
- दाखिल-खारिज से अतिक्रमण तक ‘रेट का खेल’,
- पैरवी कराई तो फाइल उलझेगी, ‘समझदारी’ दिखाई तो काम जल्द!
- ऑनलाइन आवेदन केंद्रों के आसपास कथित दलालों का जमावड़ा
Anchal Ranking आरा। सरकार की ओर से जुलाई माह में अंचलों के कामकाज के आधार पर जारी की गई रैंकिंग ने भोजपुर के कई अंचलों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। संदेश को पूरे प्रदेश में 52 रैंक प्राप्त हुआ है। जबकि जिले के बड़हरा अंचल के रैंक 532 है,जो सबसे निचले पायदान से मात्र चार रैंक पीछे है।
वही आरा सदर 321, अगिआंव 325, उदवंतनगर 357,चरपोखरी को 381,शाहपुर को 385, तरारी 394, कोइलवर 405, सहार 422,जगदीशपुर 423, गड़हनी 341, पीरो 483, बिहिया 491 रैंक मिला है।
इन अंचलों की रैंकिंग की स्थिति संतोषजनक नहीं बताई जा रही है। ऐसे में सरकारी राजस्व व्यवस्था को लेकर लोगों में नाराजगी बढ़ रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अंचल कार्यालयों में जमीन संबंधी काम कराने के लिए आम लोगों को कार्यालय के चक्कर लगाने पड़ते हैं। जबकि कथित बिचौलियों के माध्यम से काम कराने वालों की राह अपेक्षाकृत आसान हो जाती है।
Anchal Ranking: दाखिल-खारिज से परिमार्जन तक कथित रेट तय
लोगों का आरोप है कि दाखिल-खारिज, परिमार्जन और जमीन से जुड़े अन्य कार्यों के लिए कथित तौर पर अलग-अलग ‘रेट’ तय हैं। ऑनलाइन आवेदन करने वाले दुकानदारों के माध्यम से ही कई लोगों का संपर्क कथित बिचौलियों से हो जाता है। आरोप है कि आवेदन किए जाने के बाद ही आवेदक से संपर्क कर काम कराने के नाम पर रकम की मांग शुरू हो जाती है।
सामान्य मामलों में भी पांच हजार रुपये से शुरुआत होने और विवाद या त्रुटि होने पर रकम काफी अधिक पहुंचने की बातें सामने आती हैं। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
पैरवी कराने वालों की फाइल में बढ़ती हैं अड़चनें!
ग्रामीणों का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति सीधे आवेदन करता है तो उसे कई प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। वहीं, कथित रूप से ‘सेटिंग’ के माध्यम से काम कराने वालों की फाइल तेजी से आगे बढ़ने की शिकायतें हैं। लोगों का यह भी आरोप है कि पैरवी के जरिए काम कराने का प्रयास करने पर आवेदन में छोटी-छोटी त्रुटियां निकालकर उसे लंबी प्रक्रिया में उलझा दिया जाता है। इसके विपरीत कथित तौर पर ‘समझदारी’ दिखाने वालों का काम जल्द होने की चर्चा आम है।
पिता की आपत्ति के बावजूद जमीन का दाखिल-खारिज कराने का आरोप
स्थानीय लोगों ने जमीन के मामलों में गंभीर अनियमितताओं के आरोप भी लगाए हैं। एक मामले का हवाला देते हुए बताया गया कि पिता के जीवित रहते बेटे ने कीमती जमीन बेच दी। पिता की ओर से आपत्ति किए जाने के बावजूद कथित रूप से भारी रकम लेकर जमीन का दाखिल-खारिज कर दिया गया। ऐसे मामलों में राजस्व अभिलेखों और पूरी प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच की मांग उठ रही है।
परिमार्जन के नाम पर भी कथित वसूली
लोगों का आरोप है कि परिमार्जन जैसे कार्यों के लिए भी कथित तौर पर एक से दो हजार रुपये तक की मांग की जाती है। ग्रामीणों का कहना है कि जब सरकारी प्रक्रिया ऑनलाइन और पारदर्शी बनाने की बात कही जा रही है, तब भी आम लोगों को अपने काम के लिए बिचौलियों का सहारा लेना पड़ रहा है। इससे सरकार की पारदर्शी राजस्व व्यवस्था की मंशा पर सवाल खड़े होते हैं।
सरकारी जमीन पर कब्जा, नोटिस का वर्षों से चल रहा खेल
अंचल कार्यालयों की कार्यप्रणाली पर सवाल सिर्फ दाखिल-खारिज तक सीमित नहीं हैं। सरकारी जमीन पर अतिक्रमण के मामले भी कई जगह वर्षों से लंबित बताए जाते हैं। लोगों का कहना है कि सरकारी जमीन पर धीरे-धीरे कब्जा कर पहले घेराबंदी की जाती है। नोटिस आने के बाद भी कार्रवाई नहीं होने पर उसी स्थान पर मकान बन जाता है। समय बीतने के साथ दुकान, शोरूम अथवा अन्य निर्माण तक खड़े हो जाते हैं।
पहली नोटिस में घेराबंदी, दूसरी में मकान और तीसरी में दुकान!
ग्रामीणों में अतिक्रमण को लेकर एक चर्चा आम है कि पहली बार नोटिस मिलने तक जमीन की घेराबंदी होती है, दूसरी बार तक मकान खड़ा हो जाता है और तीसरी नोटिस आने तक उसी स्थान पर दुकान या शोरूम बन जाता है। कई स्थानों पर मंदिर, मजार, दुकान और मकान तक बनने की बात सामने आती है। यदि यह स्थिति सही है तो यह राजस्व और प्रशासनिक निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़ा करती है।
रैंकिंग सुधारने के साथ व्यवस्था में सुधार जरूरी
जुलाई की अंचल रैंकिंग ने एक बार फिर राजस्व व्यवस्था की जमीनी हकीकत पर बहस छेड़ दी है। जरूरत सिर्फ रैंकिंग सुधारने की नहीं। बल्कि अंचल कार्यालयों में लंबित मामलों के त्वरित निष्पादन, दलालों की भूमिका पर रोक, ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया की निगरानी और अतिक्रमण वादों में समयबद्ध कार्रवाई की है। आम लोगों का कहना है कि यदि राजस्व कार्यालयों में काम बिना किसी बिचौलिये के पारदर्शी तरीके से होने लगे तो अंचल कार्यालयों के प्रति लोगों का भरोसा फिर से मजबूत हो सकता है।















