Thursday, July 25, 2024
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बकरीद को लेकर बाजारों में चहल-पहल, क्या है कुर्बानी का महत्व?

ईद-उल-अजहा (Eid Ul Adha 2024) या ईद-उल-जुहा यानी बकरीद इस साल 17 जून 2024 सोमवार को मनाई जाएगी।

Eid Ul Adha – Bakrid: बकरीद इस्लाम के सबसे पवित्र त्यौहार में एक है। इस्लाम में साल भर में दो ईद मनाई जाती हैं। एक को ‘मीठी ईद’ कहा जाता है और दूसरी को बकरीद।

  • हाइलाइट : Eid Ul Adha – Bakrid
    • बकरीद को लेकर बकरों की कीमत में तेजी आई

आरा: ईद-उल-अजहा (Eid Ul Adha) या ईद-उल-जुहा यानी बकरीद इस साल 17 जून 2024 सोमवार को मनाई जाएगी। अकीदतमंदों ने बकरीद पर कुर्बानी देने के लिए बकरे का इंतजाम कर लिया है। बाजारों में किराना सामग्रियों की खरीदारी भी कर ली है। मालूम हो कि जिले के अकीदतमंद बकरीद के दिन बकरा की कुर्बानी देते हैं। जिले में शनिवार को कुर्बानी का बकरा दोगुने-तिगुने अधिक रेट में बिका। पांच से सात हजार रुपए में बिकने वाला बकरा दस से 15 हजार रुपए में बिकता दिखा।

इधर, कुछ ख़ास बकरे 40 से 50 हजार तक बिके। ऐसे बकरों की बोली भी लगी। वहीं कुर्बानी के लिए कई अकीदतमंद तो काफी दिनों पहले से ही बकरा खरीद लिए थे, जबकि कई ने शनिवार को भी खरीददारी की। रविवार को भी बकरा का बाजार सजेगा। कई लोग आज भी खरीदारी करेंगे। बकरीद को लेकर बकरों की कीमत में तेजी आई है। लोग अपनी हैसियत के अनुसार खरीदारी कर रहे हैं। देसी बकरे खरीदारी को लेकर शहर के लोग गांव की ओर कूच करते देखे गए।

इधर, गोपाली चौक, मौलाबाग सहित अन्य बाजारों में बकरा खरीदने के लिए भीड़ उमड़ी थी। बाजार में सुबह से लेकर शाम तक दुकानों पर खरीदारों की भीड़ रही। शहर से लेकर ग्रामीण अंचलों में बकरे बिक रहे थे। वैसे कई घरों में एक वर्ष, छह माह से ही बकरे को पूरे प्यार से पाला गया है। इन बकरों की सोमवार को बकरीद के मौके पर कुर्बानी दी जाएगी। बकरीद की नमाज ईदगाह समेत सभी बड़ी मस्जिदों में अदा की जाएगी। इसके बाद कुर्बानी का सिलसिला शुरू होगा। ईद की तरह बकरीद का त्योहार भी बहुत अहम है। मुसलमान पूरी अकीदत के साथ बकरीद मनाते हैं।

Eid Ul Adha – Bakrid – क्यों मनाई जाती है बकरीद, क्या है कुर्बानी का महत्व?

बकरीद इस्लाम के सबसे पवित्र त्यौहार में एक है। इस्लाम में साल भर में दो ईद मनाई जाती हैं। एक को ‘मीठी ईद’ कहा जाता है और दूसरी को बकरीद। ईद सबसे प्रेम करने का संदेश देती है, तो बकरीद अपना कर्तव्य निभाने का और अल्लाह पर विश्वास रखने का। ईद-उल-जुहा कुर्बानी का दिन भी होता है। बकरीद के दिन इसलिए बकरे या किसी अन्य पशु की कुर्बानी दी जाती है। इसे इस्लामिक कैलेंडर के हिसाब से आखिरी महीने के दसवें दिन मनाया जाता है।

मोहम्मद वसीम बताते हैं कि धू-अल-हिजाह जो इस्लामिक कैलेंडर का आखिरी महीना होता है। उसके आठवें दिन हज शुरू होकर तेरहवें दिन खत्म होता है। ईद-उल-अजहा यानी बकरीद इसी के बीच में इस इस्लामिक महीने की 10 तारीख को मनाया जाता है। अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से यह तारीख हर साल बदलती रहती है। क्योंकि, चांद पर आधारित इस्लामिक कैलेंडर अंग्रेजी कैलेंडर से 11 दिन छोटा होता है।

क्यों मनाई जाती है बकरीद?
मोहम्मद वसीम बताते हैं कि यह हजरत इब्राहिम के अल्लाह के प्रति अपने बेटे इस्माइल की कुर्बानी की याद में मनाया जाता है। यह इस वाकये को दिखाने का तरीका है कि हजरत इब्राहिम अल्लाह में सबसे ज्यादा विश्वास करते थे। अल्लाह पर विश्वास दिखाने के लिए उन्हें अपने बेटे इस्माइल की बलि (कुर्बानी) देनी थी। जैसे ही उन्होंने ऐसा करने के लिए अपनी तलवार उठाई, तभी अल्लाह के हुक्म से उनके बेटे की बजाए एक दुंबा (भेड़ जैसी ही एक प्रजाति) वहां पर आ गई। उनके कुर्बान करने के लिए आज इसी के आधार पर जानवर की कुर्बानी दी जाती है। इसे तीन भागों में काटा जाता है। एक भाग गरीबों में दान कर दिया जाता है। दूसरा भाग दोस्तों और रिश्तेदारों को दे दिया जाता है। और बचा हुआ तीसरा भाग परिवार खाता है।

कुर्बानी का महत्व
आगे उन्होंने बताया कि इब्राहीम से जो असल कुर्बानी मांगी गई थी। वह उनकी खुद की थी। अर्थात ये कि खुद को भूल जाओ, मतलब अपने सुख-आराम को भूलकर खुद को मानवता की सेवा में पूरी तरह लगा दो। तब उन्होंने अपने पुत्र इस्माइल और उनकी मां हाजरा को मक्का में बसाने का निर्णय लिया। मक्का उस समय रेगिस्तान के सिवा कुछ नहीं था। उन्हें मक्का में बसाकर वह खुद मानव सेवा के लिए निकल गए। इस तरह एक रेगिस्तान में बसना उनकी और उनके पूरे परिवार की कुर्बानी थी। ईद उल अजहा के दो संदेश हैं। पहला परिवार के बड़े सदस्य को स्वार्थ के परे देखना चाहिए। खुद को मानव उत्थान के लिए लगाना चाहिए। ईद उल अजहा याद दिलाता है कि कैसे एक छोटे से परिवार के जरिए एक नया अध्याय लिखा गया।

MD WASIM
MD WASIM
Journalist
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