Bihar folk artists: लौंडा नाच वह कला है जो सदियों से ग्रामीण जीवन के सुख-दुख, संघर्ष और सामाजिक ताने-बाने को अपनी लय में पिरोती आई है।
- हाइलाइट: Bihar folk artists
- इतिहास गवाह है कि लोक-कलाकारों के गरिमा को लालू जी ने किस प्रकार बढ़ाया: भाई दिनेश
पटना। लौंडा नाच केवल एक मनोरंजन की विधा नहीं, बल्कि बिहार के गांव देहात की एक समृद्ध लोक संस्कृति है। यह वह कला है जो सदियों से ग्रामीण जीवन के सुख-दुख, संघर्ष और सामाजिक ताने-बाने को अपनी लय में पिरोती आई है। हालांकि, आधुनिक शहरी समाज के एक बड़े वर्ग ने इसे संकीर्ण नजरिए से देखा है, लेकिन वास्तविकता यह है कि आज से 25-30 साल पहले यह ग्रामीण जन-जीवन का एक अभिन्न अंग हुआ करता था। भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जाने वाले पद्मश्री भिखारी ठाकुर इस लोककला के जनक और आधारस्तंभ थे। इसी लोककला की महत्ता को समझते हुए बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने इसे न केवल मंच दिया, बल्कि इसे अपनी राजनीति का एक सशक्त उपकरण भी बनाया।
Bihar folk artists : देशज संस्कृति को लालू यादव ने करीब से महसूस किया
लौंडा नाच ग्रामीणों के मनोरंजन का सबसे बड़ा और सुलभ जरिया था। लालू प्रसाद यादव का बचपन गोपालगंज के फुलवरिया गांव में बीता, जहाँ उन्होंने इस संस्कृति को बहुत करीब से महसूस किया था। उस दौर में गांवों में मनोरंजन के साधन बेहद सीमित थे। चैत्र के महीने में होने वाला चैता का दुगोला हो या शादी-विवाह के मौकों पर होने वाला ‘नाच’, यही ग्रामीणों के लिए उत्सव का मुख्य केंद्र होते थे। उस समय नृत्य की दुनिया आर्थिक आधार पर दो वर्गों में बंटी थी।
एक तरफ ‘बाई जी का नाच’ था, जिसमें महिला नर्तकियां होती थीं और उनका शुल्क काफी अधिक होता था, जिसे केवल संपन्न परिवार ही वहन कर पाते थे। दूसरी तरफ ‘लौंडा नाच’ था, जिसमें पुरुष ही स्त्री का लिबास धारण कर स्त्री होने का स्वांग रचाते थे। चूंकि यह आर्थिक रूप से सस्ता था, इसलिए गांवों के आम आदमी के लिए यही मनोरंजन का प्रमुख माध्यम बना। बारात में किस प्रकार का नाच आया है, इससे उस परिवार की सामाजिक और आर्थिक हैसियत का आकलन किया जाता था।
लोककला के एक संरक्षक के रूप में लालू प्रसाद
लालू प्रसाद यादव ने इसी जनजुड़ाव और जनसंवाद की शक्ति को पहचाना। उन्हें यह बखूबी समझ आ गया था कि लौंडा नाच केवल नृत्य नहीं है, बल्कि यह वह मंच है जहाँ कई गांवों के लोग एक साथ जुटते हैं, आपसी संवाद करते हैं और सामाजिक सद्भाव बढ़ता है। लालू ने भोजपुरी मिश्रित हिंदी के अपने ठेठ अंदाज और इसी देशज संस्कृति को अपनी राजनीति का व्याकरण बनाया। उन्होंने महसूस किया कि यदि उन्हें गरीबों और दलित-पिछड़ों के दिल तक पहुंचना है, तो उन्हें उनकी अपनी संस्कृति के साथ जुड़ना होगा। उन्होंने खुद को लोककला के एक संरक्षक के रूप में प्रस्तुत किया, जो अभिजात्य और सूट-बूट वाली राजनीति से पूरी तरह अलग था।
जब लालू ने रामचंद्र मांझी को मंच पर बुलाकर कुर्सी दी
लालू प्रसाद यादव का यह दांव राजनीति के मैदान में सुपरहिट साबित हुआ। उन्होंने मुख्यमंत्री आवास जैसे सत्ता के शीर्ष केंद्र में लौंडा नाच का आयोजन करवाकर इसे एक नया सम्मान और संरक्षण प्रदान किया। उनके इस निर्णय ने समाज के उस वर्ग को गहराई से प्रभावित किया, जो खुद को मुख्यधारा की राजनीति में उपेक्षित महसूस करता था। 1995 के विधानसभा चुनावों के दौरान भिखारी ठाकुर के सहयोगी और मशहूर कलाकार रामचंद्र मांझी को चुनावी मंच पर सम्मान देना इसी रणनीति का हिस्सा था। जब लालू ने रामचंद्र मांझी को मंच पर बुलाकर कुर्सी दी, तो उसका सकारात्मक असर पिछड़े और दलित वर्ग के वोटरों पर पड़ा। वे इसे अपने अपमान का बदला और सम्मान की पुनर्स्थापना के रूप में देखने लगे।
कलाकार को उसकी योग्यता के आधार पर दी सरकारी नौकरी
लालू प्रसाद यादव का लौंडा नाच के प्रति यह झुकाव केवल दिखावा नहीं था। वे व्यक्तिगत रूप से कलाकारों से जुड़ते थे और उनके सुख-दुख की चिंता करते थे। इसका प्रमाण यह है कि उन्होंने सीएम हाउस में नाचने वाले एक अत्यंत प्रतिभाशाली और शिक्षित कलाकार को उसकी योग्यता के आधार पर सरकारी नौकरी तक दे दी थी। यह छोटी सी लगने वाली घटना वास्तव में एक बड़े सांस्कृतिक बदलाव का संकेत थी, जहाँ एक लोक कलाकार को राज्य की सत्ता ने सम्मान की नजर से देखा।
इतिहास गवाह है कि लोक-कलाकारों को लालू जी ने गरिमा दी: भाई दिनेश
पूर्व विधायक भाई दिनेश ने कहा कि लौंडा नाच के प्रति लालू जी का दृष्टिकोण उनकी राजनीतिक दूरदर्शिता का परिणाम था। उन्होंने इस लोककला को न केवल एक मनोरंजन के रूप में देखा, बल्कि इसे गरीबों की आवाज और अस्मिता के साथ जोड़ दिया। भले ही आज के आधुनिक दौर में इस कला को लेकर अलग-अलग राय हो, लेकिन इतिहास गवाह है कि पूर्व मुख्यमंत्री ने इसे केवल सरकारी संरक्षण ही नहीं दिया, बल्कि लोक-कलाकारों को वह गरिमा भी दी, जिसकी उन्हें वर्षों से दरकार थी।




