Nitish Kumar Experimentation: वर्ष 2021 में वशिष्ठ नारायण सिंह ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व की सराहना करते हुए उन्हें एक ऐसे ‘एक्सपेरिमेंटल लीडर’ के रूप में संबोधित किया था, जिसकी मिसाल समूचे देश में विरले ही मिलती है।
- हाइलाइट: Nitish Kumar Experimentation
- नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर और बदलते आयाम
- उनकी सबसे बड़ी शक्ति उनका ‘जनता दरबार’ कार्यक्रम
पटना। जुलाई 2021 का समय भारतीय राजनीति, विशेषकर बिहार के संदर्भ में, एक महत्वपूर्ण दौर था। उस समय जनता दल यूनाइटेड के वरिष्ठ नेता और अनुभवी राजनेता वशिष्ठ नारायण सिंह ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व की सराहना करते हुए उन्हें एक ऐसे ‘एक्सपेरिमेंटल लीडर’ के रूप में संबोधित किया था, जिसकी मिसाल समूचे देश में विरले ही मिलती है। वशिष्ठ नारायण सिंह का वह वक्तव्य केवल एक प्रशंसा नहीं, बल्कि नीतीश कुमार के अब तक के राजनीतिक और प्रशासनिक सफर का एक सार था। उस समय बिहार के सुदूर अंचलों में बिजली और पानी की पहुँच, मद्य-निषेध कानून का कड़ाई से पालन, दहेज-बंदी जैसी सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध अभियान, बुनियादी ढांचे जैसे सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार, तथा दुरुस्त कानून-व्यवस्था को मुख्यमंत्री के ‘सुशासन’ का ठोस प्रमाण माना जाता था।
Nitish Kumar Experimentation: नीतीश कुमार को ‘सुशासन बाबू’ की उपाधि मिली
उस समय नीतीश कुमार की सबसे बड़ी शक्ति उनका ‘जनता दरबार’ कार्यक्रम था। वशिष्ठ नारायण सिंह का मानना था कि यह मंच न केवल मुख्यमंत्री की लोक-कल्याणकारी नीतियों का पर्याय बन गया है, बल्कि यह लोकतंत्र की उस आत्मा को भी जीवंत रखने, जहाँ हाशिए पर बैठा व्यक्ति सीधे सत्ता के गलियारों तक अपनी बात पहुँचा सकता था। जनता दरबार केवल शिकायतों के निवारण का माध्यम नहीं, बल्कि अधिकारियों की कार्य-प्रणाली और सत्ता के आचरण की समीक्षा का एक पारदर्शी जरिया था। इसी निरंतर संवाद और जन-केंद्रित निर्णयों के कारण नीतीश कुमार को ‘सुशासन बाबू’ की उपाधि मिली और उन्होंने बार-बार सत्ता के शीर्ष पर अपनी जगह बनाई।
राजनीतिक गठबंधन और सत्ता की साझेदारी
हालांकि, राजनीति का परिदृश्य समय के साथ बहुत तेजी से बदलता है, और आज के संदर्भ में उन पांच वर्ष पूर्व का मूल्यांकन एक भिन्न और चुनौतीपूर्ण तस्वीर पेश करता है। जिस ‘एक्सपेरिमेंटल लीडरशिप’ को कल तक सुशासन का आधार माना जा रहा था, आज उसी प्रयोगधर्मिता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा ने पिछले कुछ समय में जो मोड़ लिए हैं, उसने कहीं न कहीं लोकतांत्रिक मूल्यों में जनता की आस्था को डगमगा दिया है। राजनीतिक गठबंधन और सत्ता की साझेदारी के बार-बार बदलते समीकरणों ने मतदाताओं के मन में एक प्रकार की संशय की स्थिति उत्पन्न की है।
मुख्यमंत्री की कुर्सी का त्याग, तब अचंभे में पड़ गये राजनीतिक विश्लेषक
सबसे अधिक चर्चा का विषय वर्तमान राजनीतिक संरचना है, जहाँ जनादेश मिलने के बावजूद सत्ता के स्वरूप में व्यापक बदलाव देखा गया। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर भाजपा के साथ समन्वय और स्वयं की भूमिका में बदलाव के निर्णयों ने राजनीतिक विश्लेषकों को भी अचंभे में डाला दिया। आज बिहार की स्थिति यह है कि ‘डबल इंजन’ की सरकार होने के बावजूद प्रशासनिक और विकासात्मक मोर्चे पर कई चुनौतियां उभर कर सामने आई हैं। राज्य के खजाने की स्थिति को लेकर चल रही चर्चाएं और विकास कार्यों की मंद पड़ती गति आम जनमानस के लिए चिंता का विषय है।
सुशासन का स्तंभ : ‘जनता दरबार’
जिस ‘जनता दरबार’ को कभी सुशासन का स्तंभ कहा जाता था, अब सवाल उठना लाजमी हैं। यदि विकास कार्यों की गति धीमी है और आम नागरिकों को मूलभूत सेवाओं के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, तो यह स्पष्ट संकेत है कि नीति और क्रियान्वयन के बीच का सामंजस्य कहीं न कहीं टूटा है। वशिष्ठ नारायण सिंह ने तब उम्मीद जताई थी कि जनता दरबार के माध्यम से लोकतांत्रिक मूल्यों में जनता की आस्था बनी रहेगी, लेकिन वर्तमान सरकार में उस आस्था को बहाल रखने की राजनीतिक प्रयोग पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
‘सुशासन’ के उस दौर का विश्वास
राजनीति में प्रयोग करना कोई दोष नहीं है, परंतु लोकशाही तभी आबाद रहती है जब नेतृत्व के प्रयोगों का केंद्र बिन्दु जनता की आकांक्षाएं और विकास की गति हो, न कि केवल सत्ता का संतुलन। भविष्य के गर्भ में क्या है यह कहना कठिन है, परंतु वर्तमान की परिस्थितियां स्पष्ट करती हैं कि बिहार को अब राजनीतिक प्रयोगों से अधिक ठोस विकास की आवश्यकता है, जो जनता को फिर से ‘सुशासन’ के उस दौर का विश्वास दिला सके, जिसे नीतीश कुमार ने एक समय स्थापित किया था।

