Cher River Diversion: पिछले तीन दिनों से डायवर्सन बहाल होने की उम्मीद लगाए बैठे दो दर्जन से अधिक गांवों के करीब 20 से 25 हजार लोगों का शाहपुर प्रखंड मुख्यालय व बनाही स्टेशन से सीधा संपर्क पूरी तरह टूट गया है।
- हाइलाइट:Cher River Diversion
- ग्रामीणों का आरोप है कि मौजूदा संकट संवेदक की मनमानी का परिणाम
- तीसरे दिन भी आवागमन बाधित, जनजीवन प्रभावित, चिंताजनक स्थिति
आरा। भोजपुर जिले में छेर नदी का रौद्र रूप शाहपुर व बिहिया प्रखंड के लोगों के लिए एक बड़ी आपदा बनकर उभरा है। भारी बारिश के कारण नदी का जलस्तर इतना बढ़ गया है कि शाहपुर-बनाही पथ पर रूद्रनगर गांव के समीप निर्माणाधीन पुल का डायवर्सन पूरी तरह जलमग्न हो चुका है। नदी के प्रचंड वेग के आगे ग्रामीण कार्य विभाग द्वारा बिछाई गई ब्रिक बैट और बोल्डर की परतें भी नहीं टिक सकीं, जिससे दो दर्जन से अधिक गांवों के लगभग 25 हजार लोगों का प्रखंड मुख्यालय से सीधा संपर्क कट गया है। वर्तमान में स्थिति यह है कि डायवर्सन के ऊपर करीब 15 फीट की ऊंचाई तक पानी बह रहा है, जिससे किसी भी प्रकार के आवागमन की गुंजाइश खत्म हो गई है।
Cher River Diversion: मार्ग के बंद होने से जनजीवन पर गहरा असर
इस संपर्क मार्ग के पूरी तरह बाधित होने से जनजीवन पर गहरा असर पड़ा है। स्थानीय निवासियों के लिए जो दूरी पहले मात्र दो किलोमीटर की थी, अब उसे तय करने के लिए उन्हें बिहिया होकर करीब 20 किलोमीटर का लंबा सफर तय करना पड़ रहा है। इस अतिरिक्त दूरी ने दैनिक यात्रियों, किसानों, व्यापारियों और नौकरीपेशा वर्ग की कमर तोड़ दी है। सबसे चिंताजनक स्थिति मरीजों और स्कूली छात्रों की है। एम्बुलेंस का समय पर पहुंचना दूभर हो गया है, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं पर गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है। वहीं, स्कूली बच्चों की शिक्षा भी इस मार्ग के बंद होने से प्रभावित हुई है।
मौजूदा संकट संवेदक की मनमानी का परिणाम
स्थानीय निवासियों का इस स्थिति को लेकर गहरा आक्रोश है। ग्रामीणों का आरोप है कि मौजूदा संकट संवेदक की मनमानी का परिणाम है। ग्रामीणों के अनुसार, उन्होंने पूर्व में ही संवेदक को सुझाव दिया था कि पुराने पुल को तोड़े बिना बगल से नए पुल का निर्माण किया जाए, लेकिन मजदूरों ने कथित तौर पर लोहे के गार्टर और अन्य कीमती निर्माण सामग्रियों के लालच में पुराने ढांचे को ध्वस्त कर दिया।
विदित रहे कि यह पुल लकड़िया पुल के नाम से जाना जाता था। लोहे के मजबूत गर्डर और लकड़ी की कंडी (फट्टों/स्लीपरों) का उपयोग करके पुल का निर्माण किया गया था। लंबे समय तक चलने वाला यह पुल उत्कृष्ट इंजीनियरिंग का नमूना था। बाद में लकड़ी की कंडी (फट्टों/स्लीपरों) को हटाकर इसे ढलाई किया गया था। लोगों का मानना है कि यदि तकनीकी रूप से सही निर्णय लिया जाता, तो आज उन्हें इस तरह की विकट स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता।
प्रशासन की स्थिति पर बारीक नजर:
इधर, नदी के जलस्तर में लगातार बढ़ोतरी ने रूद्रनगर, गऊडाढ़ के निचले इलाकों और स्थानीय मिशनरी स्कूल के समीप तक पानी का फैलाव है। प्रशासन स्थिति पर बारीक नजर बनाए हुए है। ग्रामीण कार्य विभाग के कार्यपालक अभियंता ने स्पष्ट किया है कि जब तक नदी का जलस्तर कम नहीं होता, तब तक मरम्मत कार्य तकनीकी रूप से संभव नहीं है। उनके अनुसार, विभाग के अधिकारी और अभियंता लगातार निर्माण स्थल पर कैंप कर रहे हैं और स्थिति की समीक्षा कर रहे हैं।
रुद्रनगर मोड़ से लेकर मिशन स्कूल तक नई मुसीबत
छेर नदी का उफान कोई नई बात नहीं है। रुद्रनगर मोड़ से लेकर मिशन स्कूल तक पानी फैला रहता है। स्थानीय निवासियों ने संवेदक को इस स्थिति से पहले ही अवगत करा दिया था। रुद्रनगर मोड़ से लेकर मिशन स्कूल तक के सड़क के दोनों तरफ मजबूत बुनियादी ढांचे में छेड़-छाड़ नहीं करने की सलाह दी गई थी। लेकिन अब संवेदक की मनमानी के कारण केवल पुल के डायवर्सन ही नहीं, बल्कि रुद्रनगर मोड़ से लेकर मिशन स्कूल तक सड़क का टीके रहना भी एक नई चुनौती है।
अब सबकी निगाहें नदी के जलस्तर पर टिकी हैं। जब तक जलस्तर नीचे नहीं आता, तब तक ग्रामीणों को अपनी दैनिक दिनचर्या में इसी संघर्ष को झेलना होगा। प्रशासन की मुस्तैदी और मरम्मत कार्य की गति ही यह तय करेगी कि क्षेत्र के करीब 25 हजार लोगों की परेशानियां कब तक समाप्त हो पाएंगी।

