Pidiya Painting : जीआई” टैग प्राप्त होने से भोजपुरी कला पिड़िया को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिलेगी नई पहचान मिलेगी।
- हाइलाइट: Pidiya Painting
- संजीव सिन्हा बोले: जीआई टैग प्राप्त होने से एक नई संस्कृति यात्रा की होगी शुरुआत
- सर्जना न्यास ने पिछले वर्ष ही जीआई टैग के लिए किया था अप्लाई
आरा। बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत में लोक कलाओं का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। सदियों से चली आ रही हमारी परंपराओं में चित्रकला न केवल अभिव्यक्ति का माध्यम रही है, बल्कि यह सामाजिक मूल्यों और धार्मिक आस्थाओं को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाने का सशक्त जरिया भी है। इसी कड़ी में भोजपुरी भाषी क्षेत्र की अद्वितीय लोक चित्रकला शैली पिड़िया पेंटिंग ने एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। पिड़िया पेंटिंग को जीआई यानी भौगोलिक संकेतक टैग प्राप्त होना न केवल बिहार के लिए गर्व का विषय है, बल्कि यह राज्य की कला संस्कृति को वैश्विक मंच पर एक नई पहचान दिलाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है।
Pidiya Painting: पिड़िया पेंटिंग का सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व
पिड़िया पेंटिंग मुख्य रूप से भोजपुरी क्षेत्र की महिलाओं द्वारा पारंपरिक पर्व-त्योहारों और शुभ सामाजिक अवसरों पर बनाई जाती है। इस कला शैली की विशेषता इसके पारंपरिक प्रतीक और प्राकृतिक रंगों का प्रयोग है। इसमें ग्रामीण जीवन, पारिवारिक संबंधों की गहराई, धार्मिक निष्ठा और प्रकृति के साथ मनुष्य के जुड़ाव को अत्यंत सजीव ढंग से दर्शाया जाता है। यह कला केवल चित्रकला नहीं, बल्कि समाज का वह दर्पण है जो हमारी जड़ों से हमें जोड़े रखती है। वर्षों से महिलाओं ने अपने कौशल से इस परंपरा को जीवित रखा है, किंतु अब इसे कानूनी संरक्षण और वैश्विक पहचान मिलने का समय आ गया था।
जीआई टैग और उसका महत्व
भौगोलिक संकेतक यानी जीआई टैग किसी उत्पाद की विशिष्टता, गुणवत्ता और उसकी उत्पत्ति के भौगोलिक क्षेत्र को कानूनी मान्यता प्रदान करता है। भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री, चेन्नई द्वारा प्रदान किया जाने वाला यह टैग उत्पाद को नकल से बचाता है और बाजार में उसकी एक विशिष्ट पहचान स्थापित करता है। पिड़िया पेंटिंग को यह टैग मिलने से अब यह कला राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी एक अलग कानूनी पहचान के साथ स्थापित हो सकेगी। यह उपलब्धि न केवल उत्पाद को सुरक्षा प्रदान करती है, बल्कि यह सुनिश्चित करती है कि मूल कलाकारों को उनके कार्य का उचित सम्मान और प्रतिफल प्राप्त हो।
विकास की एक नई यात्रा: सर्जना न्यास का योगदान
इस सफलता के पीछे एक लंबी और मेहनत भरी यात्रा रही है। सर्जना न्यास के अध्यक्ष और वरिष्ठ चित्रकार संजीव सिन्हा ने बताया कि जीआई टैग प्राप्त करना कोई आसान प्रक्रिया नहीं थी। पिछले वर्ष इस दिशा में आवेदन करने के बाद विभिन्न स्तरों पर जांच और हियरिंग की प्रक्रिया पूरी की गई। इस चुनौतीपूर्ण कार्य में नाबार्ड के मुख्य महाप्रबंधक गौतम कुमार सिंह और भोजपुर के पूर्व प्रबंधक रंजीत सिन्हा का महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। साथ ही, ह्यूमन वेलफेयर एसोसिएशन वाराणसी के महासचिव और पद्मश्री डॉ. रजनीकांत का विशेष योगदान रहा, जिन्होंने दस्तावेजीकरण और कानूनी प्रक्रिया में अहम् भूमिका निभाई। सर्जना न्यास से जुड़े कलाकारों और शुभचिंतकों की सामूहिक मेहनत का ही यह परिणाम है कि आज पिड़िया पेंटिंग को यह गौरव प्राप्त हुआ है।
आत्मनिर्भर भारत और वोकल फॉर लोकल
पिड़िया पेंटिंग को मिली यह उपलब्धि भारत सरकार के आत्मनिर्भर भारत और वोकल फॉर लोकल जैसे अभियानों को सीधे तौर पर सशक्त करती है। जब स्थानीय कला को वैश्विक पहचान मिलती है, तो वह न केवल सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण करती है, बल्कि स्थानीय कलाकारों के लिए रोजगार के नए अवसर भी सृजित करती है। इससे न केवल कलाकारों की आर्थिक स्थिति में सुधार होगा, बल्कि वे अपनी कला को और अधिक निखारने के लिए प्रोत्साहित भी होंगे। संजीव सिन्हा के शब्दों में, यह केवल एक प्रमाण पत्र की उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह एक नई सांस्कृतिक यात्रा की शुरुआत है जो बिहार के पारंपरिक उद्योगों को पुनर्जीवित करेगी।




