Political security: जब सुरक्षा ऑडिट के नाम पर सुरक्षा को बढ़ाया या घटाया जाता है, तो इसके पीछे छिपी राजनीतिक मंशा जनता की नजरों से नहीं छिपती।
- हाइलाइट: Political security
- तेज प्रताप यादव को मिली थी Y प्लस श्रेणी की सुरक्षा
- मुकेश सहनी को भी दी गई थी Y प्लस वाली सिक्योरिटी
- लेकिन सुरक्षा ऑडिट के बाद वापस ले ली गई थी सुरक्षा
पटना। बिहार में सुरक्षा व्यवस्था का स्वरूप अक्सर आदर्श मापदंड से अलग दिखता है। यहां सुरक्षा केवल जान बचाने का जरिया नहीं, बल्कि सत्ता, रसूख और कद को प्रदर्शित करने का एक माध्यम बन गई है। काफिले की लंबाई और सुरक्षा में तैनात बंदूकधारियों की संख्या यहां किसी नेता की सामाजिक और राजनीतिक हैसियत का पैमाना बन चुकी है।
राज्य में अक्सर यह देखने को मिलता है कि सुरक्षा घेरा मुहैया कराने का आधार व्यक्ति का संवैधानिक पद नहीं, बल्कि उसका राजनीतिक प्रभाव और विरासत होती है। कई बार ऐसे व्यक्तियों को भी उच्च श्रेणी की सुरक्षा दी जाती है जो न तो सरकार का हिस्सा होते हैं और न ही किसी निर्वाचित पद पर होते हैं। नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार को दी गई जेड श्रेणी की सुरक्षा इसका एक सटीक उदाहरण है। पूर्व सीएम के पुत्र निशांत कुमार को तब जेड श्रेणी की सुरक्षा मिली थी जब वे किसी पद पर नहीं थे। जब भी सुरक्षा में कटौती या बढ़ोतरी की बात आती है, तो प्रशासन हमेशा गृह विभाग की रिपोर्ट और सिक्योरिटी ऑडिट का हवाला देता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि इन फैसलों पर अक्सर राजनीतिक रंग चढ़े होते हैं, जो विवादों को जन्म देते हैं।
Political security: तेज प्रताप यादव का मामला: चुनाव के समय वाई प्लस सुरक्षा
तेज प्रताप यादव के साथ जुड़ी सुरक्षा की घटनाएं इस पूरे तंत्र को समझने के लिए पर्याप्त हैं। 8 नवंबर 2025 को जब बिहार में विधानसभा चुनाव का माहौल गर्म था, केंद्र सरकार ने तेज प्रताप यादव को वाई प्लस सुरक्षा देने की घोषणा की। यह समय बेहद महत्वपूर्ण था, क्योंकि उस दौरान तेज प्रताप राजद से अलग होकर अपनी नई पार्टी के साथ चुनाव मैदान में थे और राजद के वोटों में सेंध लगा रहे थे। आलोचकों का आरोप है कि भाजपा ने चुनाव के दौरान तेज प्रताप के राजनीतिक कद को बड़ा दिखाने के लिए यह सुरक्षा दी थी, ताकि वे राजद को अधिक नुकसान पहुँचा सकें।
हालांकि, सत्ता का खेल और सुरक्षा की निरंतरता का संबंध इतना ही अस्थिर है। जैसे ही चुनाव संपन्न हुए और एनडीए को प्रचंड जीत मिली, तेज प्रताप का राजनीतिक उपयोगिता मूल्य कम हो गया। चुनाव हारने के बाद, जब वे किसी संवैधानिक पद पर नहीं रहे, तब भी सात महीने तक उन्हें वाई प्लस सुरक्षा मिलती रही। लेकिन जैसे ही उद्देश्य पूरा हुआ, सिक्योरिटी ऑडिट का तर्क देकर उनकी सुरक्षा वापस ले ली गई और उन्हें घटाकर केवल एक अंगरक्षक तक सीमित कर दिया गया। पहले जहां 11 सुरक्षाकर्मी और आर्म्ड फोर्सेज के कमांडो तैनात थे, अब वहां मात्र एक गार्ड बचा है। यह बदलाव बिहार की सुरक्षा राजनीति में स्पष्ट विरोधाभास को दर्शाता है।
मुकेश सहनी को भी वाई प्लस सुरक्षा दे कर वापस ले ली गई थी
इसी प्रकार की स्थिति पूर्व मंत्री मुकेश सहनी के साथ भी देखी गई। फरवरी 2023 में आईबी की रिपोर्ट के आधार पर उन्हें वाई प्लस सुरक्षा मिली, जो एक साल बाद वापस ले ली गई। विडंबना यह है कि जब उनके पिता की निर्मम हत्या हुई, तो सुरक्षा की अनुशंसा के बावजूद उन्हें सुरक्षा मिलने में एक महीने का लंबा इंतजार करना पड़ा, जिसने प्रशासनिक शिथिलता और राजनीतिक भेदभाव के सवालों को और बल दिया।
पशुपति पारस किसी पद पर नहीं लेकिन एक्स श्रेणी सुरक्षा
इसके विपरीत, वर्तमान परिदृश्य में पशुपति पारस जैसे नेताओं को भी एक्स श्रेणी की सुरक्षा प्राप्त है, जबकि वे इस समय किसी भी आधिकारिक पद पर नहीं हैं। यही स्थिति हरनौत के पूर्व विधायक इंजीनियर सुनील कुमार और कांग्रेस नेता शकील अहमद की भी है। वैसे तो सुरक्षा को बढ़ाना या घटाना, सिक्योरिटी ऑडिट के नाम पर होता है लेकिन इन फैसलों पर अक्सर राजनीतिक द्वेष्टा की छाप दिखाई देने से विवाद खड़ा हो जाता है। यह साबित करता है कि सुरक्षा का आवंटन केवल खतरे के आकलन पर नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की राजनीतिक प्रासंगिकता पर निर्भर करता है।

