Rakesh Ojha: स्व: विशेश्वर ओझा का जीवन एक ऐसे राजनेता का उदाहरण है जो शाहपुर दियारे से निकलकर अपने संघर्षों के बदौलत राजनीति में अपनी जगह बनाई और पूरे शहाबाद क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण प्रभाव छोड़ा।
- हाइलाइट:
- विशेश्वर ओझा: एक राजनेता का उदय और अवसान
- पुत्र द्वारा पिता के अधूरे सपनों को पूरा करने का वादा
Rakesh Ojha: शाहपुर थाना क्षेत्र के ओझवलिया गांव के मूल निवासी स्व: विशेश्वर ओझा का नाम बिहार-यूपी सीमा विवाद और शाहपुर दियारे विवाद के साथ चर्चा में आया। यह वह समय था जब उन्होंने राजनीत में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। 2005 में, उन्होंने अपनी पत्नी शोभा देवी को समता पार्टी के टिकट पर शाहपुर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ाकर जिले की राजनीति में हलचल पैदा की। उसी वर्ष हुए दूसरे चुनाव में, उन्होंने अपनी भवह (छोटे भाई की पत्नी) मुन्नी देवी को भाजपा के टिकट पर चुनाव जितवाकर अपनी राजनीतिक कुशलता का परिचय दिया। यहीं से उनके राजनीतिक सफर का véritable (वास्तविक) आरंभ हुआ।
अगले ग्यारह वर्षों तक, स्व: विशेश्वर ओझा का भाजपा नेता के रूप में राजनीति में दबदबा रहा। 2011 में, उन्होंने स्वयं भोजपुर सह बक्सर स्थानीय निकाय क्षेत्र (विधान पार्षद) चुनाव लड़ा, जो उनके बढ़ते राजनीतिक कद का परिचायक था। 2014 में उन्हें भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया, और 2015 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने शाहपुर से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा, जहाँ वे द्वितीय स्थान पर रहे। दुर्भाग्यवश, 12 फरवरी 2016 को, शाहपुर थाना क्षेत्र के सोनवर्षा गांव में अपराधियों ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी।
स्व: विशेश्वर ओझा की शाहाबाद प्रक्षेत्र में मजबूत राजनीतिक पकड़ थी। भोजपुर के अतिरिक्त, वे बक्सर, रोहतास और कैमूर जिलों में भी एक लोकप्रिय भाजपा नेता के रूप में जाने जाते थे। उनका लगभग ढाई दशक का जीवन संघर्षों से भरा रहा। बिहार-यूपी सीमा विवाद और शाहपुर दियारे के भूमि विवाद ने उन्हें सुर्खियों में ला दिया था। आज, समय के साथ, स्व:विशेश्वर ओझा के पुत्र राकेश रंजन ओझा एक बार फिर भाजपा के सिंबल पर शाहपुर विधानसभा क्षेत्र से चुनावी मैदान में हैं। वे अपने पिता के अधूरे सपनों को पूरा करने का वादा कर रहे हैं।


