Bihar Politics in the Past: शिवानंद तिवारी ने इस बात पर भी आश्चर्य व्यक्त किया कि कैसे कभी-कभी ऊपर वाला सुन लेता है और उनकी वह इच्छा पूरी हो गई।
- हाइलाइट: Bihar Politics in the Past
- शिवानंद तिवारी ने लालू प्रसाद यादव की तुलना ‘धृतराष्ट्र’ से की है
Bihar Politics in the Past: बिहार आंदोलन और उसके बाद की राजनीति में लालू प्रसाद यादव का उदय एक असाधारण घटना थी। इस दौर में कई ऐसे चेहरे भी उभरे जिन्होंने लालू के साथ मिलकर काम किया, लेकिन इनके कुछ ऐसे भी मित्र थे जिनके मन में कहीं न कहीं ईर्ष्या की भावना पलती रही। यह ईर्ष्या इतनी गहरी थी कि सत्ता मिलने के काफी समय बाद लालू प्रसाद यादव पर घोटाले का एक ऐसा मुकदमा दायर किया गया, जिसमें लालू प्रसाद यादव को काफी बदनामी उठानी पड़ी।
यह कोई सामान्य व्यक्तिगत विवाद नहीं था, बल्कि यह उस राजनीतिक परिदृश्य का हिस्सा था जहाँ महत्वाकांक्षाएं और सत्ता की चाहत अक्सर व्यक्तिगत संबंधों को भी प्रभावित करती है। शिवानंद तिवारी, जो मंत्री पुत्र थे, खुद भी राजनीतिक क्षेत्र में अपनी पहचान बनाना चाहते थे, लालू के बढ़ते कद से शायद असहज महसूस कर रहे थे। आंदोलन की आग में तपकर निकले लालू यादव ने आम लोगों के बीच एक मजबूत पैठ बना ली थी, जो शायद तिवारी को खटकती थी।
हालांकि, राजनीति की अपनी अलग चाल होती है। व्यक्तिगत मनभेद के बावजूद, लालू प्रसाद यादव ने ‘मित्र धर्म’ का पालन करने की अपनी विशिष्ट शैली का प्रदर्शन किया। उन्होंने शिवानंद तिवारी को न केवल विधायक बनाया, बल्कि उन्हें मंत्री पद से भी नवाजा। यह लालू की उस राजनीतिक कुशलता का प्रतीक था जहाँ वह विरोधियों को भी साथ लाने या कम से कम उन्हें साधने में माहिर थे।
यह मित्रता और राजनीतिक साथ 2025 के विधानसभा चुनावों तक चलता रहा। लालू प्रसाद यादव की पार्टी ने राहुल तिवारी को लगातार तीसरी बार टिकट दिया, जो उनके राजनीतिक संबंध की निरंतरता को दर्शाता है। लेकिन, राजनीति हमेशा एक सी नहीं रहती। जब राहुल तिवारी चुनाव हार गए, तो शिवानंद तिवारी के सुर अचानक बदल गए। जिस लालू प्रसाद यादव ने उन्हें और उनके बेटे पर मेहरबानी दिखाई, उसी लालू पर अब उन्होंने तीखे प्रहार शुरू कर दिए है।
अपने बयान में शिवानंद तिवारी ने लालू प्रसाद यादव के साथ बिताए जेल के दिनों की यादें ताजा कीं, जब वे दोनों बिहार आंदोलन के दौरान फुलवारी शरीफ़ जेल में एक ही कमरे में बंद थे। तिवारी ने बताया कि उस आंदोलन का चेहरा भले ही लालू यादव थे, लेकिन उनकी महत्वाकांक्षाएँ सीमित थीं। तिवारी के अनुसार, रात में सोने के समय लालू यादव ने उनसे अपने भविष्य के सपनों को साझा किया था। “बाबा, मैं राम लखन सिंह यादव जैसा नेता बनना चाहता हूँ,” लालू ने कहा था। तिवारी ने इस बात पर भी आश्चर्य व्यक्त किया कि कैसे कभी-कभी ऊपर वाला सुन लेता है और उनकी वह इच्छा पूरी हो गई।
शिवानंद तिवारी ने लालू प्रसाद यादव की तुलना ‘धृतराष्ट्र’ से की है। यह एक बहुत ही गंभीर और प्रतीकात्मक आरोप है। महाभारत के पात्र धृतराष्ट्र अपनी दुर्बलता और पुत्रमोह के कारण महाभारत के युद्ध के लिए जिम्मेदार माने जाते हैं। शिवानंद तिवारी के इस बयान का गहरा अर्थ है। वह संभवतः यह कहना चाह रहे हैं कि लालू प्रसाद यादव अपने पुत्रमोह में इतने अंध हो गए हैं कि वह अपने दल की वर्तमान स्थिति और भविष्य की संभावनाओं को ठीक से समझ नहीं पा रहे हैं। यह आरोप लालू यादव पर सीधा सवाल है।
एक तरफ जगदानंद सिंह जो हार के बाद लालू आवास पहुंचे और मित्र को गले लगाकर भरोषा दिलाया, वही दूसरी ओर शिवानंद तिवारी का यह ब्यान बिहार की राजनीति की गहरी जड़ों और जटिलताओं को उजागर करता है। यह दिखाता है कि कैसे व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं, राजनीतिक रिश्ते, वफादारी और विश्वासघात समय के साथ बदलते रहते हैं। शिवानंद तिवारी का यह अचानक बदला हुआ रुख शायद पुत्र की हार से उपजी निराशा और हताशा का परिणाम है, या यह लालू यादव के प्रति उनके मन में वर्षों से पल रही किसी गहरी असंतुष्टि का प्रकटीकरण है।
राजनीति में ऐसे उतार-चढ़ाव आम हैं, जहाँ कल के साथी आज के विरोधी बन जाते हैं और जहाँ सत्ता की राह में रिश्ते-नाते गौण हो जाते हैं। राजनीति में न केवल वादों और इरादों का खेल होता है, बल्कि यह ऐसे मोड़ों से भी भरी होती है जहाँ दोस्ती, वफादारी और आभार के भाव समय के साथ बदलते रंग दिखाते हैं। लालू प्रसाद यादव, जिन्होंने खुद इतने उतार-चढ़ाव देखे हैं, शायद इस तरह के बदलावों के आदी हों। लेकिन शिवानंद तिवारी का यह बयान जिससे उनकी पुरानी निष्ठाओं पर प्रश्नचिन्ह लग गया है।
Bihar Politics in the Past: मित्र धर्म की कसौटी: शिवानंद तिवारी के बदलते तेवर और राजनीति का स्याह सच
शिवानंद तिवारी, बिहार की राजनीति में एक जाना-माना नाम हैं। उनका राजनीतिक जीवन कई उतार-चढ़ावों से भरा रहा है। लेकिन, इस कहानी के केंद्र में हैं राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के प्रमुख लालू प्रसाद यादव और शिवानंद तिवारी का वो रिश्ता, जिसकी मिसालें अक्सर दी जाती थीं। लालू प्रसाद यादव ने शिवानंद तिवारी के प्रति जिस तरह का स्नेह और विश्वास दिखाया, वह राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय रहा है। एक मित्र के तौर पर, लालू प्रसाद यादव ने न केवल शिवानंद तिवारी को विधायक बनाया, बल्कि उन्हें मंत्री पद की गरिमा से भी नवाजा। यह दोस्ती की पराकाष्ठा थी, जहाँ एक नेता ने अपने करीबी पर भरोसा जताते हुए उसे सत्ता के शिखर तक पहुँचाया।
लेकिन, दोस्ती का यह सफर यहीं नहीं रुका। लालू प्रसाद यादव ने शिवानंद तिवारी के प्रति अपने सद्भाव को बढ़ाते हुए, उनके व्यवसायी पुत्र राहुल तिवारी को भी राजनीतिक मंच प्रदान किया। उन्हें विधायक बनाया गया, जिससे यह स्पष्ट था कि लालू प्रसाद यादव न केवल शिवानंद तिवारी के साथ, बल्कि उनके पूरे परिवार के साथ एक गहरा जुड़ाव महसूस करते थे। इस अटूट विश्वास और सहयोग का सिलसिला 2025 के चुनाव तक जारी रहा। लेकिन, राजनीति में अक्सर हालात अप्रत्याशित मोड़ ले लेते हैं।
दुर्भाग्यवश, 2025 के चुनावों में राहुल तिवारी को हार का सामना करना पड़ा है। यह हार न केवल राहुल तिवारी के लिए, बल्कि शिवानंद तिवारी के लिए भी एक बड़ा झटका है। और इसी हार के साथ, शिवानंद तिवारी के “शूर” यानी तेवर, तेज़ी से बदलने लगे। जिस पार्टी ने उन्हें और उनके पुत्र को इतनी बार नवाजा, जिस पार्टी के नेता ने उन पर अटूट विश्वास दिखाया, उसी पार्टी और उसी नेता के प्रति उनके सुर बदलने लगे। यह परिवर्तन इतना स्पष्ट और अचानक था कि इसने राजनीतिक पर्यवेक्षकों को हैरान कर दिया।
शिवानंद तिवारी ने इस हार के बाद जो बयानबाजी शुरू की, जो आलोचनाएं कीं, वे उनके पुराने रुख से बिलकुल विपरीत थीं। उन्होंने पार्टी नेतृत्व, चुनाव प्रबंधन और संभावित रूप से कुछ अन्य आंतरिक मुद्दों पर सवाल उठाना शुरू कर दिया। यह व्यवहार ऐसे समय में आया जब उन्हें पार्टी के प्रति अधिक निष्ठावान और वफादार होना चाहिए था, खासकर उस पार्टी के प्रति जिसने उनके राजनीतिक जीवन को संवारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
मित्र धर्म का पालन करने वाले लालू प्रसाद यादव द्वारा शिवानंद तिवारी को सत्ता के शिखर तक ले जाना, मंत्री बनाना, और फिर उसके पुत्र को भी विधायक बनाना – यह लालू प्रसाद यादव की उदारता और दोस्ती की भावना का प्रतीक था। लेकिन, जब परिणाम पक्ष में नहीं रहे, तो उसी नेता और पार्टी पर उंगली उठाना, मित्र धर्म की उस कसौटी पर खरा नहीं उतरता, जहाँ संकट के समय में एक-दूसरे का साथ देना अपेक्षित होता है।
शिवानंद तिवारी का बदलता रुख कई महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े करती है:
- क्या राजनीतिक निष्ठा केवल तभी तक कायम रहती है जब तक लाभ हो?
- क्या सत्ता में रहते हुए किए गए एहसानों को भूला जा सकता है?
- क्या हार के बाद किसी पार्टी या नेता की आलोचना करना उचित है, जिसने आपको इतना कुछ दिया हो?
- क्या मित्र धर्म केवल अच्छे समय के लिए है, या यह बुरे समय में भी साथ निभाने का नाम है?
शिवानंद तिवारी का यह बदलता रुख बिहार की राजनीति में उन अंतर्विरोधों को उजागर करता है, जहाँ व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं और सत्ता की चकाचौंध अक्सर मानवीय मूल्यों और एहसानफरामोशी पर भारी पड़ जाती है। यह मामला हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या आज के दौर में सच्ची मित्रता और वफादारी की कोई जगह बची है, या फिर यह सब कुछ केवल राजनीतिक समीकरणों और स्वार्थों के इर्द-गिर्द ही घूमता है।



