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शाहपुर प्रखंड की राजनीति का ऊंट किस करवट बैठेगा, 30 मई को होगा तय

Shahpur Pramukh Election: पर्दे के पीछे से खेल खेलने वाले रसूखदार लोगों ने भी अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। सत्ता के इस संघर्ष में साम, दाम, दंड और भेद की नीति का पुरजोर इस्तेमाल किया जा रहा है।

  • हाइलाइट: Shahpur Pramukh Election
  • होर्स ट्रेडिंग से लेकर ठंढई पार्टी तक, अविश्वास प्रस्ताव ने बढ़ाई हलचल
  • 19 के आंकड़े पर टिकी शाहपुर की राजनीति, प्रमुख समर्थक और विरोधी आमने-सामने
  • अविश्वास प्रस्ताव को लेकर तेज हुई सियासी सरगर्मी, पंससों की गोलबंदी चरम पर
  • क्या अविश्वास प्रस्ताव पारित होगा या प्रमुख अपने पद को बचाने में कामयाब रहेंगी?
  • शाहपुर प्रखंड की राजनीति का ऊंट किस करवट बैठेगा, यह आने वाला 30 मई तय करेगा।

24 मई, आरा। शाहपुर प्रखंड की राजनीति में इन दिनों हलचल चरम पर है और इसका मुख्य केंद्र बिंदु प्रखंड प्रमुख गीता देवी के खिलाफ लाया गया अविश्वास प्रस्ताव है। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप और आदेश के बाद उपजी इस स्थिति ने पूरे प्रखंड के सियासी गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के लिए आगामी 30 मई की तिथि निर्धारित की गई है, जिसके साथ ही प्रखंड की राजनीति में जोड़-तोड़ और रणनीति का एक नया दौर शुरू हो गया है।

Shahpur Pramukh Election: पार्टी के बहाने होर्स ट्रेडिंग की अटकलें

पंचायत समिति के सदस्यों के बीच सक्रियता और लामबंदी, राजनीतिक दृष्टिकोण से देखें तो इस समय प्रखंड में गतिविधियों का स्वरूप किसी बड़े चुनाव से कम नहीं है। क्षेत्र में होर्स ट्रेडिंग की अटकलें जोरों पर हैं, वहीं मेल-मिलाप और समर्थन जुटाने के लिए लिट्टी पार्टी, चाय पार्टी और ठंढई पार्टी जैसे आयोजन आम हो गए हैं। ये आयोजन मात्र खान-पान का साधन नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन और अपनी संख्या बल को सुरक्षित रखने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हैं।

एक बड़ा धड़ा की खामोशी आने वाले दिनों में क्या गुल खिलाएगी:

वर्तमान में प्रखंड की स्थिति को यदि गौर से देखें, तो स्पष्ट होता है कि सदस्य दो गुटों में बंटते नजर आ रहे हैं। कुछ पंचायत समिति सदस्य अपनी निष्ठा को सार्वजनिक कर चुके हैं, जबकि एक बड़ा धड़ा अभी भी चुप्पी साधे हुए है। यह खामोशी आने वाले दिनों में क्या गुल खिलाएगी, यह बड़ा प्रश्न है। पर्दे के पीछे से खेल खेलने वाले रसूखदार लोगों ने भी अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। सत्ता के इस संघर्ष में साम, दाम, दंड और भेद की नीति का पुरजोर इस्तेमाल किया जा रहा है।

दोनों ही ओर से बहुमत के दावे:

प्रखंड प्रमुख गीता देवी और उनके विपक्षी गुट, दोनों ही ओर से बहुमत के दावे किए जा रहे हैं। हालांकि, जमीन पर रणनीति काफी अलग और पेचीदा दिखाई दे रही है। जानकार सूत्रों के अनुसार, प्रमुख समर्थक गुट की प्राथमिक रणनीति सदन में कोरम को पूरा होने से रोकने की है। उनका तर्क है कि यदि सदन में निर्धारित संख्या में सदस्य नहीं पहुंचेंगे, तो अविश्वास प्रस्ताव पर होने वाली बैठक स्वतः ही निष्प्रभावी हो जाएगी। इसके विपरीत, विरोधी गुट की पूरी ताकत सदन में आवश्यक संख्या बल जुटाकर प्रस्ताव को पारित कराने पर लगी हुई है।

अविश्वास प्रस्ताव के लिए दो-तिहाई सदस्यों की उपस्थिति अनिवार्य:

संख्या गणित के आंकड़ों पर गौर करें तो शाहपुर प्रखंड में पंचायत समिति सदस्यों के कुल 28 पद निर्धारित हैं। वर्तमान में दो सदस्यों के निधन के कारण रिक्त सीटों के बाद सदन की वास्तविक स्थिति में बदलाव आया है। नियमों के अनुसार, सदन की कार्यवाही और अविश्वास प्रस्ताव के लिए दो-तिहाई सदस्यों की उपस्थिति अनिवार्य है, जो कि 19 के आंकड़े के करीब बैठती है। इसी गणित के आधार पर प्रमुख समर्थक गुट का लक्ष्य कम से कम 10 सदस्यों को अपने पाले में बनाए रखना है, ताकि कोरम के अभाव में बैठक को भंग किया जा सके।

निगाहें 30 मई की बैठक पर :

यह स्थिति पिछले 20 महीनों से चली आ रही कानूनी खींचतान का परिणाम है। प्रखंड प्रमुख की कुर्सी को लेकर हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक जो लड़ाई लड़ी गई, उसने प्रशासनिक स्थिरता को प्रभावित किया है। अब जब मामला न्यायपालिका के हस्तक्षेप के बाद फिर से राजनीति के मैदान में है, तो सभी की निगाहें 30 मई की बैठक पर टिकी हैं।

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