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क्या पांच दिनों में ही डगमगाने लगा है अमेरिका?

Iran-US War: वैश्विक संघर्ष का बदलता स्वरूप: क्या पांच दिनों में ही डगमगाने लगा है अमेरिका?

  • हाइलाइट: Iran-US War
  • ट्रंप आरोप:बाइडन प्रशासन ने यूक्रेन को बड़ी मात्रा में सैन्य सहायता और हथियार उपलब्ध कराए
  • किंतु अमेरिकी हथियारों के अपने निजी भंडार को पुन: भरने पर ध्यान नहीं दिया गया

Iran-US War: वर्तमान वैश्विक संघर्ष को शुरू हुए अभी मात्र पांच दिन ही बीते हैं, लेकिन इसके कूटनीतिक और सामरिक परिणाम अभी से स्पष्ट होने लगे हैं। दुनिया की महाशक्ति कहे जाने वाले अमेरिका की स्थिति इस समय अत्यंत चुनौतीपूर्ण और चिंताजनक नजर आ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह युद्ध आने वाले चार से पांच सप्ताह तक खिंच सकता है, और स्वयं अमेरिकी नेतृत्व के बयानों में भी वह आत्मविश्वास नजर नहीं आ रहा है जो आमतौर पर वाशिंगटन की पहचान रहा है।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का हालिया बयान इस ओर स्पष्ट संकेत करता है। उनके वक्तव्यों में छिपी चिंता यह दर्शाती है कि युद्ध के मैदान के हालात अमेरिका के पक्ष में नहीं हैं। सुरक्षा की दृष्टि से खाड़ी देशों में अमेरिका की उपस्थिति तेजी से सिमट रही है। बहरीन और जॉर्डन में रह रहे अमेरिकी परिवारों और गैर-आपातकालीन कर्मचारियों को तत्काल देश छोड़ने के निर्देश दिए गए हैं। इतना ही नहीं, कुवैत और सऊदी अरब में अमेरिकी दूतावासों का बंद होना एक बड़े कूटनीतिक संकट की ओर इशारा करता है। रियाद स्थित दूतावास पर हुए हमले के बाद पूरे सऊदी अरब में काउंसलर कार्यालयों पर ताले लटकना यह सिद्ध करता है कि क्षेत्र में अमेरिका की सुरक्षा साख दांव पर लगी है।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण पहलू हथियारों की उपलब्धता और सैन्य आपूर्ति का है। पहली बार अमेरिकी नेतृत्व ने यह स्वीकार किया है कि वे हथियारों के भंडार को लेकर दबाव में हैं। हालांकि यह कहा जा रहा है कि संसाधनों की कमी नहीं है, लेकिन वर्तमान नेतृत्व की नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप लग रहे हैं कि पूर्व राष्ट्रपति बाइडन प्रशासन के दौरान यूक्रेन को बड़ी मात्रा में सैन्य सहायता और हथियार उपलब्ध कराए गए, किंतु अमेरिकी हथियारों के अपने निजी भंडार को पुन: भरने पर ध्यान नहीं दिया गया। परिणामतः, आज जब अमेरिका को स्वयं के लिए और अपने रणनीतिक हितों के लिए हथियारों की आवश्यकता है, तो उसे दोबारा से भंडार जमा करने की प्रक्रिया शुरू करनी पड़ रही है।

अमेरिका की इस डगमगाती स्थिति ने दुनिया के उन तमाम देशों के बीच हड़कंप मचा दिया है जो अपनी सुरक्षा और आर्थिक नीतियों के लिए अमेरिकी समर्थन पर निर्भर रहे हैं। चार दिन के भीतर पैदा हुई इस अस्थिरता ने वैश्विक मंच पर एक अनिश्चितता का माहौल बना दिया है। यदि यह संघर्ष अगले चार से पांच सप्ताह तक जारी रहता है, तो अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन में बड़े फेरबदल की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

युद्ध के शुरुआती दौर ने ही अमेरिका की सामरिक तैयारी और उसकी विदेश नीति की सीमाओं को उजागर कर दिया है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अमेरिका इस संकट से उबरने के लिए क्या कदम उठाता है, क्योंकि उसकी हर नीति का सीधा प्रभाव वैश्विक शांति और स्थिरता पर पड़ना तय है।

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