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आरा के ‘द होली सेवियर चर्च’ और महाराजा जॉर्ज पंचम का बिहार आगमन

Church Ara: बिहार की ऐतिहासिक धरोहर: भोजपुर जिले के आरा शहर में स्थित ‘द होली सेवियर चर्च’

  • हाइलाइट: Church Ara
    • वर्ष 1911 में यूनाइटेड किंगडम के महाराजा जॉर्ज पंचम भारत दौरे पर आए थे
    • इस दौरान महाराजा जॉर्ज पंचम कोलकाता से दिल्ली की ओर प्रस्थान कर रहे थे
    • शाही मेहमान के धार्मिक आस्था के सम्मान में आरा शहर में ‘द होली सेवियर चर्च’ का निर्माण

बिहार के समृद्ध इतिहास में कई ऐसी इमारतें हैं जो अपने साथ अनूठी कहानियाँ समेटे हुए हैं। जब बात पुराने चर्चों की आती है, तो पटना का पादरी हवेली निःसंदेह सबसे प्राचीन है, जिसका निर्माण लगभग 200 वर्ष पूर्व हुआ था। किंतु, इसी कड़ी में भोजपुर जिले के आरा शहर में स्थित ‘द होली सेवियर चर्च’ का नाम भी बड़े आदर के साथ लिया जाता है। इसका निर्माण वर्ष 1911 में हुआ था, लेकिन इसके पीछे की कहानी इसे एक साधारण इमारत से कहीं अधिक बना देती है। यह चर्च केवल एक पूजा स्थल ही नहीं, बल्कि ब्रिटिश राज के एक महत्वपूर्ण पड़ाव और एक अनूठी ऐतिहासिक घटना का जीवंत प्रमाण है, जिसकी जड़ें भारत के उपनिवेशीय अतीत से गहराई से जुड़ी हैं।

इस चर्च का इतिहास अत्यंत रोचक और घटनापूर्ण है। यह उस समय की बात है जब ब्रिटिश साम्राज्य अपने चरम पर था और यूनाइटेड किंगडम के महाराजा जॉर्ज पंचम भारत दौरे पर आए थे। वर्ष 1911 में, महाराजा जॉर्ज पंचम कोलकाता से दिल्ली की ओर प्रस्थान कर रहे थे। इसी यात्रा के दौरान उनका बिहार से भी आगमन हुआ था। उस समय की ब्रिटिश सरकार ने उनकी धार्मिक आस्था और प्रार्थना की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए, एक अल्पकालिक व्यवस्था के तहत एक चर्च (Church Ara) के निर्माण का निर्णय लिया था। यह निर्णय तत्कालीन ब्रिटिश प्रशासन की तत्परता और शाही मेहमान के प्रति उनके सम्मान को दर्शाता है।

Church Ara: 114 वर्षों से मजबूती से खड़ा आरा का ‘द होली सेवियर चर्च’

यह जानकर आश्चर्य होता है कि जिस चर्च का निर्माण मात्र एक दिन की प्रार्थना के लिए किया गया था, वह आज 114 वर्षों से अधिक समय से न केवल मजबूती से खड़ा है, बल्कि बिहार की अमूल्य ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर के रूप में अपनी पहचान बनाए हुए है। आरा का ‘द होली सेवियर चर्च’ इतिहास के पन्नों में अपनी विशेष जगह रखता है। पादरी अनिल, जो इस चर्च से जुड़े हुए हैं, इसकी कहानी साझा करते हुए बताते हैं कि “इसका इतिहास 114 साल पुराना है। बात उस समय की है जब 1911 में ब्रिटिश शासन के दौरान यूनाइटेड किंगडम के महाराजा जॉर्ज पंचम भारत दौरा पर आए थे। अंग्रेजों ने इन्हीं के एक दिन की प्रार्थना करने के लिए इस चर्च का निर्माण कराया था।”

वे आगे बताते हैं, “जॉर्ज पंचम कोलकाता से दिल्ली जा रहे थे, इस दौरान उनके एक दिन की प्रार्थना के लिए एक चर्च का निर्माण कराया गया था। जॉर्ज पंचम प्रभु ईशु की प्रार्थना करना चाहते थे। इसलिए एक दिन की प्रार्थना के लिए इस चर्च का निर्माण कराया गया था। जॉर्ज पंचम के चले जाने के बाद इसमें अंग्रेज फौजी प्रार्थना करने के लिए आया करते थे। अंग्रेज जब भारत से चले गए तो इसे आम ईसाइयों के लिए खोल दिया गया।” इस प्रकार, एक अस्थायी उद्देश्य के लिए बनी संरचना ने एक स्थायी धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व प्राप्त कर लिया, जो बाद में स्थानीय ईसाई समुदाय के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया।

महाराजा जॉर्ज पंचम, जिनका नाम इस चर्च के इतिहास से जुड़ा है, यूनाइटेड किंगडम और अन्य राष्ट्रमंडल समूह के महाराजा थे। वे पहले ब्रिटिश शासक थे जिनका संबंध विंडसर राजघराने से था। उन्होंने वर्ष 1910 से 1936 तक शासन किया, और इस दौरान ब्रिटिश साम्राज्य ने कई महत्वपूर्ण परिवर्तनों का अनुभव किया। इतिहासकारों और जानकारों के अनुसार, जब वे भारत दौरे पर आए थे, उसी दौरान 12 दिसंबर 1911 को भारत की राजधानी को कोलकाता से बदलकर दिल्ली करने की ऐतिहासिक घोषणा की गई थी। उनका यह दौरा भारत के राजनीतिक और प्रशासनिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ था, जिसने देश की राजधानी के स्थानांतरण के साथ-साथ कई अन्य प्रशासनिक सुधारों की नींव रखी।

महाराजा जॉर्ज पंचम का प्रभाव केवल चर्च के निर्माण तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि आरा शहर की भौगोलिक पहचान में भी उनके नाम की छाप आज तक मौजूद है। शहाबाद वर्तमान भोजपुर जिले के आरा शहर में आज भी उनके नाम पर एक प्रमुख मार्ग है, जिसे स्थानीय लोग ‘केजी रोड’ या ‘जॉर्ज रोड’ के नाम से जानते हैं। पादरी अनिल बताते हैं कि “इसी जगह पर जॉर्ज पंचम के लिए अंग्रेजों ने लाल कार्पेट बिछाया था। तब से इस जगह का नाम केजी रोड (किंग जॉर्ज रोड) पड़ गया।” यह सड़क आज भी उस ऐतिहासिक क्षण की याद दिलाती है जब एक ब्रिटिश सम्राट ने इस भूमि पर कदम रखा था, और यह स्थानीय इतिहास का एक अटूट हिस्सा बन चुकी है।

अपनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के साथ-साथ, ‘द होली सेवियर चर्च’ अपनी धार्मिक गतिविधियों और विशेष रूप से क्रिसमस के पर्व के लिए भी जाना जाता है। हर साल, क्रिसमस-डे के मौके पर इस 114 साल से भी अधिक पुराने चर्च में खास इंतजाम किए जाते हैं। इस वर्ष भी, 25 दिसंबर को प्रभु यीशु मसीह के जन्मदिन के अवसर पर आरा में क्रिसमस का पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। शहर के रमना मैदान के पास, जज कोठी मोड़ पर स्थित द होली सेवियर चर्च में विशेष कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा। इस शुभ अवसर के लिए चर्च परिसर को आकर्षक ढंग से सजाया गया है।

इस दौरान ईसाई समाज के लोग प्रभु यीशु मसीह के जन्म से जुड़े धार्मिक अनुष्ठान, विशेष प्रार्थना सभा, मधुर भजन-कीर्तन एवं विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों में उत्साहपूर्वक शामिल होंगे। इन आयोजनों में ईसाई समाज के लोगों के साथ-साथ अन्य धर्मावलंबी भी बड़ी संख्या में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं, जो विभिन्न समुदायों के बीच सौहार्द और एकता का प्रतीक है।

आरा का ‘द होली सेवियर चर्च’ केवल ईंट और गारे से बनी एक संरचना मात्र नहीं है, बल्कि यह एक जीवित इतिहास है, एक ऐसा स्मारक जो ब्रिटिश राज के एक महत्वपूर्ण दौर, एक सम्राट की यात्रा और एक अल्पकालिक इरादे के स्थायी परिणाम को दर्शाता है। यह बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत का एक अभिन्न अंग है, जो अपनी कहानियों, परंपराओं और भव्यता के साथ आज भी मजबूती से खड़ा है।

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