Homeबिहारआराक्या आरा सदर अस्पताल दलालों का अड्डा बन चुका है?

क्या आरा सदर अस्पताल दलालों का अड्डा बन चुका है?

ISO Accredited Hospital: आरा सदर अस्पताल: स्वास्थ्य सेवा के नाम पर मरीजों से बदसलूकी और प्रशासनिक संवेदनहीनता का बोलबाला

jay kumar
  • हाइलाइट: ISO Accredited Hospital रिपोर्ट- जितेंद्र कुमार
  • ऑपरेशन करा चुके मरीज को अस्पताल में दोबारा न घुसने की मिली धमकी

आरा। भोजपुर के ISO मान्यता प्राप्त आरा सदर अस्पताल इन दिनों अपनी स्वास्थ्य सुविधाओं से अधिक वहां व्याप्त अव्यवस्था और आए दिन होने वाली अप्रिय घटनाओं के कारण चर्चा में बना रहता है। जिले के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल की स्थिति वर्तमान में ऐसी हो गई है कि यहाँ उपचार के लिए आने वाले मरीज और उनके परिजन खुद को असुरक्षित और अपमानित महसूस करने को मजबूर हैं।

पत्रकार जितेंद्र कुमार के समक्ष शुक्रवार को सदर अस्पताल के सर्जिकल वार्ड, कमरा संख्या 69 में एक ऐसी घटना सामने आई, जिसने अस्पताल की छवि पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार, एक मरीज को डिस्चार्ज किए जाने के बाद उसके महत्वपूर्ण कागजात देने में घंटों की देरी की गई। मरीज और उसके परिजन बार-बार अपने कागजात की मांग कर रहे थे, लेकिन वहां तैनात कर्मियों द्वारा लगातार टाल-मटोल किया जा रहा था। चौंकाने वाली स्थिति यह थी की वार्ड में तैनात स्टाफ अपनी ड्यूटी छोड़कर ऑपरेशन थिएटर (ओटी) के बगल में स्थित एक गोदाम में जमा होकर हंसी-मजाक और मौज-मस्ती में व्यस्त थे।

ISO Accredited Hospital: पत्रकार बुलाने की बात पर भड़क उठा युवक

अस्पताल की इस घोर लापरवाही के बीच जब मरीज स्वयं अपने कागजात लेने के लिए उस स्थान पर पहुंचा, तो वहां उपस्थित कर्मियों का व्यवहार अत्यंत शर्मनाक था। वे अपने काम पर ध्यान देने के बजाय आपस में मोबाइल की छीना-झपटी कर रहे थे। इसी गहमागहमी और खींचातानी के दौरान कमरे का दरवाजा सीधे मरीज के उस हिस्से पर जा लगा, जहां उसका हाल ही में ऑपरेशन हुआ था। शारीरिक पीड़ा और अस्पताल की इस कार्यशैली पर जब मरीज ने विरोध जताया और पत्रकार बुलाने की बात कही, तो वहां उपस्थित एक युवक ने सारी मर्यादाएं लांघ दीं।

उक्त युवक ने न केवल मरीज को नसीहत देने की कोशिश की, बल्कि अभद्र भाषा का प्रयोग करते हुए स्वयं को ‘पत्रकार का बाप’ तक बता डाला। इतना ही नहीं, उसने ऑपरेशन करा चुके मरीज को अस्पताल में दोबारा न घुसने देने और देख लेने की धमकी तक दे डाली। यह घटना स्पष्ट करती है कि अस्पताल में कार्यरत कुछ असामाजिक तत्वों या कर्मियों का मनोबल किस कदर बढ़ा हुआ है कि उन्हें कानून या प्रशासन का कोई भय नहीं है।

मामले की गंभीरता को देखते हुए जब मरीज ने अपने बेड पर वापस लौटकर जिले के सिविल सर्जन को उनके सरकारी नंबर पर फोन कर आपबीती सुनाई, तो उनका जवाब और भी निराशाजनक था। एक जिम्मेदार पद पर बैठे अधिकारी ने समाधान निकालने के बजाय मरीज को ही यह सलाह दे डाली कि ‘अस्पताल में सेवा भाव से रहिए अन्यथा आने की कोई जरूरत नहीं है।’ जब पीड़ित ने इस पूरे प्रकरण की शिकायत जिलाधिकारी से करने की बात कही, तो सिविल सर्जन ने बीच में ही फोन काट दिया।

प्रशासनिक संवेदनहीनता का आलम यहीं समाप्त नहीं हुआ। शिकायत के कुछ ही देर बाद अस्पताल प्रबंधन ने अपनी गलती सुधारने के बजाय एक निजी व्यक्ति (कथित दलाल) को मामले को रफा-दफा करने के लिए मरीज के पास भेजा। उस व्यक्ति के हस्तक्षेप के बाद आनन-फानन में मरीज को उसके अधूरे कागजात सौंप दिए गए। जब वहां उपस्थित अन्य स्टाफ से बदसलूकी करने वाले व्यक्ति का नाम और पद पूछा गया, तो सभी ने चुप्पी साध ली और मामले को दबाने की कोशिश करते हुए कहा कि ‘अस्पताल में ऐसी बातें होती रहती हैं, इसे भूल जाइए।’

Bijay singh
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