Panchkosi Mela: अहिरौली से पंचकोसी परिक्रमा के आरंभ होता है, जहाँ प्रतिवर्ष हजारों श्रद्धालु परिक्रमा के प्रथम चरण के रूप में पहुँचते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह स्थान महर्षि गौतम ऋषि की तपोस्थली रहा है।
- हाइलाइट: Panchkosi Mela
- बिहार के बक्सर में आयोजित पंचकोसी मेला: एक अद्वितीय सांस्कृतिक और धार्मिक समागम
Panchkosi Mela: बिहार के बक्सर जिले में आयोजित पंचकोसी मेला देश भर के श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। यह मेला, जो हर साल पांच दिनों तक चलता है, धार्मिक आस्था, परंपरा और लोक संस्कृति का एक अनूठा संगम प्रस्तुत करता है। पांच कोस (लगभग 15 किलोमीटर) की दूरी तय करते हुए, यह परिक्रमा अपने आप में एक आध्यात्मिक यात्रा का अनुभव कराती है।
पंचकोसी मेले का आरंभ बक्सर के निकट स्थित अहिरौली नामक ग्राम से होता है, जहाँ माता अहिल्या का प्राचीन मंदिर स्थित है। माना जाता है कि भगवान श्रीराम के वन भ्रमण के दौरान माता अहिल्या को उनके चरणों के स्पर्श से मुक्ति मिली थी। इस पावन स्थली से मेले की शुरुआत होना, इसके धार्मिक महत्व को और भी अधिक बढ़ा देता है। पहले दिन अहिरौली में श्रद्धालु एकत्र होते हैं, पूजा-अर्चना करते हैं और इस यात्रा का शुभारंभ करते हैं।
दूसरे दिन, मेले का कारवां नदांव की ओर बढ़ता है। यह स्थान भी अपनी धार्मिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के लिए जाना जाता है। तीसरे दिन, मेला भभुअर पहुंचता है, जहाँ स्थानीय परंपराओं और मान्यताओं के अनुसार अनुष्ठान किए जाते हैं। चौथे दिन, श्रद्धालु बड़का नुआंव की ओर प्रस्थान करते हैं, और अंततः पांचवें दिन, मेले का समापन बक्सर के पवित्र चरित्रवन में होता है। चरित्रवन का उल्लेख रामायण में भी मिलता है, जहाँ भगवान श्रीराम ने कुछ समय व्यतीत किया था।
मेले के दौरान, पाँच दिनों में श्रद्धालु विभिन्न प्रकार के पकवान बनाकर भगवान को समर्पित करते हैं। इन पकवानों में सबसे प्रमुख है लिट्टी-चोखा। वैसे तो लिट्टी-चोखा बिहार का एक प्रिय व्यंजन है, लेकिन बक्सर के पंचकोसी मेले और भगवान श्रीराम से जुड़े होने के कारण इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है। ऐसा माना जाता है कि त्रेतायुग में, जब भगवान श्रीराम पंचकोसी परिक्रमा कर रहे थे, तब उनका स्वागत इसी स्वादिष्ट व्यंजन से किया गया था। इस ऐतिहासिक संदर्भ के कारण, मेले के दौरान लिट्टी-चोखा बनाना और उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करना एक सदियों पुरानी परंपरा है।
Panchkosi Mela: त्रेतायुग से जुड़ी बक्सर के पंचकोशी मेला की कथा
पंचकोशी मेले के पीछे की कथा अत्यंत प्राचीन और प्रेरणादायक है। यह कथा त्रेतायुग के उस कालखंड से जुड़ी है जब भगवान श्री राम, गुरु विश्वामित्र के साथ, ऋषियों की सिद्ध तपोभूमि सिद्धाश्रम आए थे। उस समय, यज्ञों में विघ्न डालने वाले दुष्ट राक्षस ताड़का, मारीच और सुबाहु का संहार भगवान राम ने इसी क्षेत्र में किया था। राक्षसों के वध के पश्चात, भगवान राम ने इसी सिद्ध भूमि में निवास करने वाले पांच महान ऋषियों के आश्रमों का भ्रमण किया और उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया। जिन पांच पवित्र स्थलों पर वे गए, वे ही स्थल आज पंचकोसी परिक्रमा के मुख्य पड़ाव माने जाते हैं।
मान्यता है कि इन पांच पड़ावों पर भगवान राम के आगमन के दौरान, स्थानीय निवासियों ने उनका अपने-अपने सामर्थ्य और उपलब्धता के अनुसार स्वागत किया। जो भी वस्तुएं उस समय स्थानीय रूप से उपलब्ध थीं, उनका प्रयोग करके उन्होंने भगवान राम का सत्कार किया। इसी परंपरा का निर्वाह करते हुए, यह मेला आदि काल से अनवरत रूप से आयोजित होता आ रहा है।
पंचकोसी मेला का पहला पड़ाव अहिरौली
अहिरौली से पंचकोसी परिक्रमा के आरंभ होता है, जहाँ प्रतिवर्ष हजारों श्रद्धालु परिक्रमा के प्रथम चरण के रूप में पहुँचते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह स्थान महर्षि गौतम ऋषि की तपोस्थली रहा है। ऐसी मान्यता है कि यहीं पर महर्षि गौतम ने अपनी पत्नी अहिल्या को उनके कथित अपराध के लिए श्राप दिया था, जिसके परिणामस्वरूप अहिल्या एक शिला (पत्थर) में परिवर्तित हो गईं। यह श्रापित अवस्था अहिल्या के लिए एक कठोर दंड थी, जिसने उन्हें सदियों तक इस रूप में जीवन बिताने पर विवश किया।
इस पौराणिक आख्यान का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आता है जब भगवान श्रीराम अपनी यात्रा के दौरान इस स्थान पर पधारे। कथाओं के अनुसार, भगवान श्रीराम के चरण स्पर्श मात्र से शिला रूपी अहिल्या अपने श्राप से मुक्त हो गईं और अपने पूर्व स्वरूप को पुनः प्राप्त कर सकीं। अहिल्या की मुक्ति की इस कथा के साथ ही, इस स्थान को एक और महत्वपूर्ण पहचान प्राप्त है – इसे हनुमान जी का ननिहाल भी कहा जाता है।
पौराणिक मान्यता यह है कि देवी अहिल्या की एक पुत्री थीं, जिनका नाम अंजनी था। इन्हीं अंजनी के गर्भ से पवनपुत्र हनुमान का जन्म हुआ था। इस प्रकार, अहिरौली का रिश्ता हनुमान जी से भी जुड़ जाता है, जो इस स्थान की महत्ता को और अधिक बढ़ाता है। पंचकोसी मेले के अवसर पर लाखों की संख्या में भक्तगण इस ऐतिहासिक और पवित्र भूमि पर पहुंचकर, अहिल्या के उद्धार और हनुमान जी के जन्म से जुड़ी कथाओं का स्मरण करते हैं।
पंचकोशी मेले का दूसरा पड़ाव नदांव गांव
पंचकोशी मेले का दूसरा महत्वपूर्ण पड़ाव नदांव गांव है, जो अपनी अलौकिक महत्ता और प्राचीन परंपराओं के लिए विख्यात है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह पवित्र भूमि कभी महर्षि नारद का आश्रम हुआ करती थी। इस प्राचीन स्थल पर आज भी नर्वदेश्वर महादेव का भव्य मंदिर और नारद सरोवर सुशोभित है, जो श्रद्धालुओं के लिए श्रद्धा का केंद्र हैं।
नदांव गांव की अपनी एक विशेष प्रथा है, जहाँ आने वाले श्रद्धालु श्रद्धापूर्वक खिचड़ी-चोखा बनाकर ग्रहण करते हैं। यह परंपरा एक अत्यंत मार्मिक और पवित्र कथा से जुड़ी हुई है। ऐसी मान्यता है कि जब भगवान राम और लक्ष्मण इस क्षेत्र से गुजर रहे थे, तब महर्षि नारद के आश्रम में उनका खिचड़ी-चोखा से ही स्वागत किया गया था। इस ऐतिहासिक प्रसंग की स्मृति में, आज भी यहाँ के श्रद्धालु इसी व्यंजन को बनाकर भगवान को अर्पित करते हैं और स्वयं भी प्रसाद रूप में ग्रहण करते हैं।
पंचकोशी मेले का तीसरा पड़ाव भभुअर गांव
नदांव के पश्चात, पंचकोशी मेले का तीसरा पड़ाव भभुअर गांव आता है। यह ग्राम भी अपने आप में एक अद्वितीय महत्व रखता है। किंवदंतियों के अनुसार, भभुअर कभी महर्षि भार्गव की तपोभूमि थी। यहाँ महर्षि भार्गव का आश्रम हुआ करता था। इस पावन स्थल से जुड़ी एक और रोचक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि स्वयं भगवान राम ने अपने बाणों से इस स्थान पर एक विशाल तालाब का निर्माण किया था। भगवान के इस दिव्य कर्म के परिणामस्वरूप ही इस स्थान का नाम ‘भभुअर’ पड़ा। इस गांव में भार्गवेश्वर महादेव का मंदिर भी स्थित है, जहाँ भक्तगण श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना करते हैं।
भभुअर की एक विशेष परंपरा यह है कि यहाँ के श्रद्धालु पूजा-अर्चना के उपरांत चूड़ा का सेवन करते हैं। यह प्रथा भी उस स्थान की पौराणिक महत्ता से जुड़ी हुई है। यह माना जाता है कि चूड़ा का सेवन यहाँ की आध्यात्मिक ऊर्जा को बढ़ाने और मनोकामनाओं की पूर्ति में सहायक होता है। पंचकोशी मेले के ये दोनों पड़ाव, नदांव और भभुअर, न केवल भक्तों को पवित्रता और आस्था का अनुभव कराते हैं, बल्कि ये हमें उस गौरवशाली अतीत की याद दिलाते हैं जब महान ऋषि-मुनियों और भगवान के अवतारों का आगमन इन भूमियों पर हुआ था। इन स्थानों की यात्रा श्रद्धालुओं के लिए एक आत्मिक शुद्धि और अलौकिक आनंद प्रदान करती है।
पंचकोशी मेला का चौथा पड़ाव बड़का नुआंव गांव
बक्सर पंचकोशी मेला (Panchkosi Mela) का चौथा पड़ाव बड़का नुआंव गांव है। इस स्थान का धार्मिक और पौराणिक महत्व अत्यंत गहरा है। मान्यता है कि यहीं पर उद्दालक मुनी का आश्रम स्थापित था, जो प्राचीन काल में ऋषियों और तपस्वियों का प्रमुख केंद्र हुआ करता था। बड़का नुआंव की पौराणिक प्रासंगिकता माता अंजनी और पवनपुत्र हनुमान के निवास से जुड़ी हुई है। किंवदंतियों के अनुसार, यह वह पवित्र भूमि है जहाँ माता अंजनी ने हनुमान को जन्म दिया था। इस स्थान पर भक्तगण पूरी निष्ठा और श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना करते हैं। यहाँ की एक अनूठी परंपरा यह है कि मंदिर में विशेष रूप से मूली का प्रसाद चढ़ाया जाता है। यह प्रसाद भक्तों के बीच वितरित किया जाता है और इसे अत्यंत पवित्र माना जाता है।
बक्सर पंचकोशी मेले का अंतिम और पांचवां पड़ाव
बक्सर पंचकोशी मेले (Panchkosi Mela) का अंतिम और पांचवां पड़ाव चरित्रवन है, जो एक और महत्वपूर्ण आध्यात्मिक केंद्र है। यह स्थान महर्षि विश्वामित्र की तपोभूमि के रूप में विख्यात है। पंचकोशी परिक्रमा का समापन यहीं होता है, और इस समापन को एक विशेष उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
चरित्रवन क्षेत्र में अंतिम दिन एक भव्य लिट्टी-चोखा भोज का आयोजन किया जाता है। यह आयोजन विश्वामित्र मुनी के इस स्थान की पवित्रता को और भी बढ़ाता है। इस भोज में श्रद्धालु स्वयं उपले जलाकर लिट्टी बनाते हैं। तैयार की गई लिट्टी को आलू और बैगन के चोखे के साथ परोसा जाता है। इस स्वादिष्ट और पौष्टिक भोजन को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। यह प्रसाद भक्तों की ओर से महर्षि विश्वामित्र को अर्पित किया जाता है और फिर इसे ग्रहण किया जाता है।



