Homeधर्मपर्व त्योहारहोली केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि टूटे हुए रिश्तों को जोड़ने...

होली केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि टूटे हुए रिश्तों को जोड़ने का सेतु…

Holi 2026: आज हमारे पास चेहरे पर लगाने के लिए पक्के रंग तो हैं, लेकिन रिश्तों में भरने वाली वह पुरानी मिठास और गहराई कहीं खो गई है।

  • हाइलाइट: Holi 2026
  • पहले हम ‘बुरा न मानो होली है’ कहकर अपनों को गले लगाते थे, लेकिन आज
  • यह आत्मीयता ‘सीन’ (Seen) मैसेज और सोशल मीडिया के ‘लाइक’ तक सीमित

Holi 2026: होली का नाम आते ही मन में उमंग और उल्लास के अनगिनत रंग उभरने लगते हैं। भारतीय संस्कृति में इस पर्व को आपसी कटुता मिटाने, प्रेम बढ़ाने और सामूहिक सौहार्द के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। परंतु, बदलते परिवेश और आधुनिकता की अंधी दौड़ में होली के वे पारंपरिक रंग अब फीके पड़ते जा रहे हैं। आज हमारे पास चेहरे पर लगाने के लिए पक्के रंग तो हैं, लेकिन रिश्तों में भरने वाली वह पुरानी मिठास और गहराई कहीं खो गई है।

पुराने समय में होली की पहचान आत्मीयता से होती थी। लोग बिना किसी औपचारिक निमंत्रण के एक-दूसरे के घर पहुँच जाते थे। मोहल्ले की गलियों में गूंजती ढोलक की थाप और फाग के गीतों में जो अपनापन था, वह अब मोबाइल की रिंगटोन और डिजिटल संदेशों में सिमट कर रह गया है। पहले हम ‘बुरा न मानो होली है’ कहकर अपनों को गले लगाते थे, लेकिन आज यह आत्मीयता ‘सीन’ (Seen) मैसेज और सोशल मीडिया के ‘लाइक’ तक सीमित होकर रह गई है। विडंबना यह है कि अब बिना स्टेटस अपडेट किए किसी का दरवाज़ा खटखटाना भी शिष्टाचार के विरुद्ध माना जाने लगा है।

होलिका दहन का मूल आध्यात्मिक संदेश अहंकार और बुराइयों का अंत करना था। भक्त प्रह्लाद की भक्ति और होलिका के दहन की कथा हमें सिखाती है कि सत्य की जीत तभी होती है जब हम अपने भीतर के ‘मैं’ को त्याग दें। दुखद पहलू यह है कि आज होलिका की अग्नि में हमारा अहंकार नहीं, बल्कि हमारी मानवीय संवेदनाएं जल रही हैं। हम अपनों को रंगों से नहीं, बल्कि कड़वे शब्दों, तानों और तुलनाओं के रंगों से रंगने लगे हैं। प्रदर्शन की इस संस्कृति ने पर्व की पवित्रता को बाज़ारवाद के हवाले कर दिया है।

होली कभी सामाजिक समरसता का सबसे बड़ा उदाहरण हुआ करती थी, जहाँ अमीर-गरीब और छोटे-बड़े का भेद मिट जाता था। परंतु वर्तमान में यह उत्सव भी ‘वीआईपी’ और ‘साधारण’ की श्रेणियों में विभाजित हो गया है। एक तरफ भव्य डीजे पार्टियों और कृत्रिम चकाचौंध के बीच आयोजित होने वाली होली है, तो दूसरी तरफ उन सूने आंगनों की खामोशी है जहाँ आज भी कोई अपनों की राह देख रहा है। हम अपनी तस्वीरों में फिल्टर लगाकर दुनिया को यह तो दिखा देते हैं कि हमारी होली बहुत ‘ग्रैंड’ थी, लेकिन उस तस्वीर के पीछे के अकेलेपन को छुपा ले जाते हैं।

आज का समय हमसे यह प्रश्न कर रहा है कि क्या हम वास्तव में त्योहार मना रहे हैं या केवल रस्मों की नुमाइश कर रहे हैं? हम बाज़ार से महंगे से महंगे रंग और मिठाइयाँ तो खरीद लाते हैं, लेकिन रिश्तों में स्नेह का रंग और बातचीत में मिठास घोलना भूल जाते हैं। होली की वास्तविक विजय तभी संभव है जब यह पर्व केवल चेहरे तक सीमित न रहकर दिलों तक पहुँचे।

यदि हमारे उत्सव की चकाचौंध में पड़ोस की उदासी शामिल नहीं है, तो हमारी होली अधूरी है। हमें वापस उस दौर की ओर लौटना होगा जहाँ होली केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि टूटे हुए रिश्तों को जोड़ने का सेतु थी। इस बार गुलाल लगाने से पहले किसी का हाथ थामें, किसी के दुख को बांटें और अपने अहंकार को दहन कर वास्तविक मानवीय गरिमा को अपनाएं। होली की सार्थकता चेहरों को रंगने में नहीं, बल्कि मन के सूनेपन को खुशियों से भरने में है।

RAVI KUMAR
RAVI KUMAR
बिहार के भोजपुर जिला निवासी रवि कुमार एक भारतीय पत्रकार है एवं न्यूज पोर्टल खबरे आपकी के प्रमुख लोगों में से एक है।
- Advertisment -
Bharat Ji Shahpur
School AD

Most Popular